किसी ने पूछा सत्य
क्या है
शाश्वत क्या है,
मैंने कहा− सत्य
जीवन है।
इसके बाद क्या है,
मैंने कहा− कुछ नहीं
शून्य,
मृत्यु
पैदायश से लेकर
अंत तक ही तो
तू है।
चुन्नू,
मुन्नू,घुन्नू,
नथवा,फतवा, हरिया,चरिया,
रामू, श्यामू,राधा
−मीरा,
रधिया, हीरा,
कोर्इ भी नाम हो,
रर्इस भी गरीब भी,
दलित भी , सवर्ण भी,
सुंदर भी, सुंदरी
भी,
प्रेयसी भी, प्रियतम
भी,
प्रिय भी, प्राणानाथ
भी,
नादिर शाह भी,
सिंकदर भी तैमूर लंग भी,
आल्हा भी ,
उदल भी,
मुहम्मद गजनबी भी,
पृथ्वीराज चौहान भी,
एक परिचय,
एक पहचान,
एक वैभव,
ये सब जीवन तक ही तो हैं।
इसके बाद तो कुछ भी
नहीं,
बस एक देह, एक बॉडी,
एक शरीर।
कुछ जला दिए जाते
हैं।
कुछ दफना दिए जाते
हैं।
अपनी −अपनी परंपराओं के अनुसार,
पंचभूत में मिला दिए
जातें हैं।
इसके बाद नहीं रहता
कुछ शेष
इसलिए मित्रों
जब तक जीवन है जियो,
खेलो, कूदो,
खुश रहो।
प्यार बांटो, खुशी
दो।
र्इश्वर से मिली
सांसों का
सदुपयोग करो।
खुशियां बांटो,
खुशियां बटोरो।
जीवन को हंसकर जियो।
मौत जब आए तो
उससे भी हंसकर मिलो।
उसे भी प्रिय और प्रेयसी मानो
सदा नर्इ मंजिल,
नर्इ यात्रा की
तैयारी रखो।
ज्यादा रिश्ते,
तामझांम ज्यादा
परेशान करते हैं।
मोह बढाते हैं।
सब सीमित करो।
नर्इ यात्रा, नए सफर
के लिए
हर समय तैयार रहो।
अशोक मधुप