Thursday, 5 September 2024

सखि ही सही , तुम हो तो

 सखि ही सही , तुम हो तो ।

जीवन - साथी न सही, 
पर साथ हो तो ।
अच्छा है कि तुम -हम 
मित्र हैं। अच़्छे मित्र !

दुख- सुख के साथी।

एक दूसरे के मददगार।

एक दूसरे को समझने वाले ,
मित्रता में बराबर के साझीदार।

चेहरा देखकर ही ,भाव पहचानने वाले।
आवाज से मन की बात ,जान जाने वाले।

अच्छा हुआ हम नहीं ,बन पाए पति -पत्नी।

नहीं बन पाए जीवन सखा।

नहीं बॅध पाए दांपत्य सूत्र में।

पति -पत्नी होते तो ,नहीं होता

बराबर का रिश्ता।

नहीं होती ,बराबर की पहचान।

पुरुष प्रधान समाज में तुम्हें!

नहीं मिलता बराबर का मान।

बराबर का सम्मान।

बराबर का दर्जा ,कभी नहीं पातीं।

कभी झिकड़की झेलतीं,

तो कभी डाँट पातीं।

कभी -कभी तो बेवकूफ

और पागल जैसे शब्दों से

सम्मानित की जातीं । 

तुम पति  के   इशारों पर मुस्करातीं।

उसके गुस्से पर कुम्हला जातीं।

घर को अपना सर्वस्व देंती।
पति के लिए सजतीं,
उसी के लिए सँवरती।

पर बहुत कुछ झेलतीं। 

कभी बच्चों में ,तो कभी परिवार में बॅटतीं।

प्यार में भी सब का बराबर हिस्सा करतीं।

तुम करती सबसे न्याय,

पर तुम गृहणी होकर भी ,पति से कम रहतीं।

पति का वर्चस्व बना रहे ,

इसलिए हर पर्व पर पति के पाँव छूतीं

उसे पति परमेश्वर मानतीं।

और पति कभी नहीं मानता 
तुम्हें अपने बराबर।

तुम्हारे लिए वह पति परमेश्वर होता,

किंतु  तुम उसके लिए कभी 
  देवी नहीं बन पातीं।

तुम तो उसकी पत्नी ही रहतीं।

  वह करता  तुम पर शक ।

सप्तपदी के सारे  वचन तुम्हारे लिए रहते ,

सारी जिम्मेदारी तुम्हारी होंती।

तुम साल में कई बार उसके पाँव छूतीं,

कहने पर पाँव दबातीं।

सिर में तेल और बालों में मेंहदी भी लगातीं।
पति के आफिस जाते समय उसकी 
टाई ठीक करतीं।
उसके आफिस जाते समय तैयार 
होने में मदद करतीं।
आफिस से लौटने पर 
दरवाजे पर संजी उसका  इंतजार करती  होतीं।
आफिस से लौटने के बाद 
उसके फ्रेश होते तक चाय तैयार कर लेंती।
उसकी पंसद, न पसंद का ध्यान  रखतीं ।
पर तुम्हारे  आफिस जाने के समय 
तुम्हें तैयार होने में कोई मदद नहीं करता।
लौटने पर कितनी ही थकी –हारी
होतीं,
 पर किसी को नहीं होता तुम्हारा ध्यान 
न कोई तुम्हें एक गिलास  पानी पकड़ाता,
नही तुम्हारे लिए 
एम कप चाय बनाता।
किसी को नही होता तुम्हारी 
थकान का भान।
तुम आते ही घर के काम− काज 
में लग जातीं।       
तुम्हारे बीमार या थके होने से

नहीं होता किसी का वास्ता,

किसी परिवार के दूसरे सदस्य का लेना −देना।

तुम तेज बुखार होने, शरीर टूटने

 के बाद भी परिवार के लिए जूझतीं।
रोजमर्रा की तरह 
सारे काम वैसे ही निपटातीं।
तुम्हारी परेशानी में 
न पति सिर में तेल लगाता।

न  कोई पाँव  दबाता।
न तुम्हारी पंसद− नापसंद 
 का ख्याल  रखता।
सब कुछ तुम्ही झेलतीं।
सारी जिम्मेदारी तुम्हारी ही होती। 
बहुत अच्छा हुआ मित्र!

हम नहीं बंध सके प्रणय -बंधन में ।

नहीं परवान चढ़ सका अपना प्यार।
अब हम न लड़ते हैं, ना झगड़ते हैं।
मित्र  हैं साथ साथ चलते हैं।

अशोक मधुप

चाँद से मैं कहने लगा

 इक दिवस, चाँद से  मैं कहने लगा ।

क्यों तू प्रियजनों को वेदना देने लगा ?
चाँद बोला -मुझे क्यों दोष देते हो ?
चाँद तो बेकसूर है ।
उज्ज्वल चाँदनी उसका नूर है।
जग को शीतलता देता है ।
उसकी पीड़ा को हरता है।
 विरह -वेदना के आँसू लेकर,
फूलों को दे देता है ।
उनको खिलता -मुस्कुराता देखकर ,
हर्षित  होता है ।
फिर चला जाता है, परदेस ,
वहाँ पर देता है संदेस ,
मित्रों के स्नेह और ममत्व का, 
उमंग भरे मिलन का ।                      
सुगंध उनके देश की माटी की ,
यादें पूनम की रातों की।
चाँद को मीत बनाओगे तो ,
परदेस में भी उसके दर्शन पाओगे।
 गगन में उसके आलोक से ,
अपनत्व की प्रतीति होगी।
चाँदनी की शीतलता से ,
सुखद अनुभूति होगी। 
विदेश में उस से बढ़ कर ,
नहीं कोई विभूति होगी।

कितना कुछ है बदला



देखो कितना  कुछ है बदला,
जवानी बदली ,
बचपन बदला।
तुम न बदले
मैं ना बदला।
यह तो बिल्कुल
साफ- सही है।
दिल में है यादों का डेरा।
तुम कहते हो
मंजिल पा ली ,
हमने पूछा कब हुआ सवेरा ?
रात घनेरी ,चंदा उजला।
दुनिया सुख-दुख का मेला ।
दर्द ,गमों को,
भूल गया है।
हमसे तो 
अच्छा है पगला।
जीवन की डगर होती अनजानी!
राह चलता , राही भूला ।
पर कभी कोई अनजाना ,
संबल बन आ जाता है, 
आशा की किरण जगा जाता है ।

मस्त रहो, शाद रहो

  ऐसे गंभीर न होओ

मस्त रहो, शाद रहो।
 दोस्त ज़हां भी रहो,
खुश रहो, आबाद रहो।
मै अजीब सी कशमकश में हूँ।
जहाँ भी भीड़ होती है।
उसमें उलझ जाता हूँ।
कहीं खो सा जाता हूँ ।
लोग कहते हैं ,कि मैं उस भीड़ में ,
बोरा सा जाता हूँ।
कुछ चेहरे खोजने
लगता हूँ,उन बेगानों में
कुछ अपने खोजने
लगता हूँ।
कुछ भूले-बिसरे सपने
देखने की कोशिश करता हूँ।
याद करने लगता हूँ।
अपने में परिवर्तन सा अनुभव करता हूँ ।
अतीत को दोबारा दोहराना चाहता हूँ । 
कुछ मीठी यादों की कसक है, 
जिन्हें भुला नहीं पाता हूँ ।
मुझे बहुत सुनने की,
आदत हो गई है।
बहुत कुछ सहना स्वभाव बन गया है । 
क्यों चुप रहना भाने लगा है ?
अतीत अब क्यों सताने लगा है ?
शायद  मैं अब मन से ,
दुर्बल और भावुक हो गया हूँ ।
आयु का यह पड़ाव ही ,
इस विवशता का कारण है ।
जब कुछ छूटने सा लगता है,
मन अशांत होने लगता है ।
मोह के बंधन सशक्त होने लगते हैं।
अधिक से अधिक सामीप्य चाहने लगते हैं।
जीवन के सफर में थक सा गया हूँ ।
लगता है कि मैं अब 
बूढ़ा हो गया हूँ।
लोग कहते हैं 
मैं पागल हो गया हूँ।
पर पागल की तो
याददाश्त चली
जाती है,मुझे तो यादें ही सताती हैं।
अतीत की स्मृतियाँ जीवन की अमूल्य थाती हैं।
अभी भी मन को अत्यंत भाती हैं।
मैं वही पुराना 
अपना अतीत
याद करता हूँ,
सुखद पलों को ,उस अहसास को ,
जो बिछुड़े, फिर नहीं मिले,
 उन अपनों को ढूॅढता हुआ 
बड़बड़ाता रहता हूँ।
तुम कहते हो,
मैं पागल हो गया हूँ।

प्यार मत करो

 

प्यार मत करो।
दोस्ती मत करो ।
तटस्थ रहो।
दुश्मनी करो।
जो चाहे करो।
मृदु कहो या
 कटु कहो ,
बात होनी चाहिए ।
 सिलसिला कभी नहीं 
अवरुद्ध होना चाहिए ।
मीत हो तो प्रीत का ,
शत्रु बन कर शत्रुता का ,
निर्वाह होना चाहिए ।
क्रम  कुछ तो इस प्रकार ,
 चलता रहना चाहिए।
दरिया बहते ही पावन
रहता है।
जल स्वच्छ रहता है।
रुकने पर तो सड़ता है।
  अतः रुको मत ,
चलते रहो ।
कुछ करते रहो।
करना और गति ही ,
जीवन की पहचान है।
नहीं तो जिंदा और 
मुर्दा एक समान है।

किंतु तुम वहाँ नही हो

 किंतु तुम वहाँ  नही हो


तुम्हारे मुहल्ले से निकलते 
आज भी मैं
तुम्हारे घर के
दुमंजिले की उस 
दीवार को जरूर 
देखता हूँ।
इसी दीवार के पीछे
ही तो  खड़ी होकर 
तुम मेरा इंतजार
करतीं थीं।
दीवार के पीछे चमकती थीं
तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी 
आंखें और सिर।
अब तो  वहाँ कुछ 
भी नजर नहीं आता।
बहुत  साल बीत गए,
अब तो  यह दीवार भी
बूढी हो गई
मेरी तुम्हारी तरह
सालों से नही हुई 
इसकी पुताई
प्लास्टर भी 
जगह− जगह 
से झर गया है।
आने लगी हैं
दरार।
कुछ पेड़ भी उग आए हैं।
काफी बड़े दीखने  लगे 
दीवारों में उगे ये पेड़ ।
इन पेड़ों की तरह ही तो
हमारे बच्चे  अब 
जवान हो गए हैं।
इतने साल बाद भी 
मुझे तुम्हारे 
घर के सामने से निकलते
इस दीवार को देखने की मेरी 
ललक नहीं गई 
अब पता नहीं 
परिवार के साथ
तुम कहां  होंगी।
पर मेरा मन नहीं मानता।
बरबस दीवार पर नजर 
चली ही जाती है।
खोजती रहती है तुम्हें।

तुम आऒ एक बार

 फिर होली आ गयी है।

दीवानगी छा गयी है।
सोए अरमान फिर जगे हैं,
सपने सजने से लगे हैं।
फिर तुम्हारा इंतजार है।
दिल बेकरार सा है,चेहरे पर
लगाने की जगह रंग,बालों में
भर जाए।
काश तुम आओ,
फिर दोहराओ कि
 चेहरे पर नहीं,
इन से बालों को रंगना है।
रंग चेहरे को  प्यार करने लायक
नहीं छोड़ेंगे।
बाल तो काले हैं।
इनका क्या बिगड़ता है?
काश ,ये चांदी से होते।
फिर रंग खूब जमता।
तुम कहतीं थीं और 
कहकर खिलखिलाती थीं।
आज ये चांदी से ही हैं।
काश तुम होली पर
भूली- भटकी चली आऒ।
मेरे बालों को अलग −अलग 
रंगों से सराबोर कर दो।
रंग दो इन्हें ईस्टमैन कलर में।
काश ! ऐसा हो जाए ।
तुम्हारी 
खिलखिलाहट फिर सुनाई दे जाए।
कह दो कि बाल आज रंगीन हो गए हैं।
होली में हम रंग गए हैं।
तुम आऒ एक बार।
बहुत है इंतजार।

तुम क्या हो मैं नहीं जानता

  तुम क्या हो मैं नहीं जानता।

दुनिया तुम्हें जो कहती है,
मेरा मन तुम्हें वह नहीं मानता।
तुम वह नहीं हो।
कोई तुम्हें चांद कहता है।
कोई ऑखों का तारा ।
मेरी नजर में,
न तुम चांद हो।
न तो सितारा।
तुम तो हो अलग ,
इन सबसे पृथक।
चांद, सितारे तो निद्रा के कारक हैं।
आलस्य का नाम हैं।
आराम की  धरोहर हैं।
सुस्ती की पहचान हैं।
किंतु  तुम ऐसी नहीं हो।
इनसे विपरीत हो ।
छाया  सी शीतल ,प्रकाश सी कोमल ।
तुम्हें क्या कहूँ?
सूर्य की पहली किरण।
उषा, भोर या प्रथम रश्मि की लालिमा ? 
तुम्हारे आने की बेला में,
प्रकृति झूमने लगती है।
गाने लगती है।
आनंद मनाने लगती है।
फूल ख़िलने लगते हैं।
कलियाँ चटकने लगती हैं।
पक्षी गुनगुनाने लगते हैं।
पेड़- पौधे स्वर्णिम प्रकाश में,
नहाने लगते हैं।
संसार की दिनचर्या शुरू 
होने लगती है।
स्फूर्ति  जागती है ।
प्राणी बिस्तर त्यागने लगते हैं।
आलस्य  होता है विलीन ।
जीवन होता है गतिशील।
शांत रास्ता और पगडंडियाँ ,
होती हैं कोलाहलमय। 
जीवंत हो उठता है संसार ।
इसीलिए कहता हूँ तुम 
चांद नहीं  हो।
तारे भी  नहीं हो।
तुम तो कुछ और हो।
 सब से अलग ,
जीवनदायिनी प्रकृति की ।
ऊर्जा सृष्टि की।
पहली किरण सूर्य की ।
भोर का उजाला सी 
उषा की सिन्दूरी आभा सी।

अमेरिका का टेम्पा शहर।

 अमेरिका का टेम्पा शहर।

समुद्री तट पर स्थित 
फ्लोरिडा प्रदेश का अत्यंत खूबसूरत शहर!
बड़ा बेटा रहता है यहां।
आजकल उसके पास आया हुआ हूँ।
कुछ पारिवारिक  जिम्मेदारी निभाने।
आवश्यक  कार्य निपटाने।
आज हम घूमने आया हैं समुद्र किनारे,
दूर दूर तक लहराता समुद्र,
मन को उद्विग्न करने लगा है ।
 किनारे पर बिछी शीतल रेत में ,
बैठ जाता हूँ, सुकून की तलाश में।
ऐसी जगह जहाँ
लहरें आतीं है,
मेरे पाँव को छूकर लौट जाती हैं।
उनके शीतल स्पर्श  का अहसास ,
सुखद प्रतीत होता है ।
तुम्हारे साथ बिताए पलों में पहुँचा देता है । 
समुद्र की मचलती ,उमड़ती ,
लहरों को देख रहा हूँ, 
 निहार रहा हूँ।
तरंगों  की तरह मन में ख्याल
आ रहे हैं ,जा रहें हैं।
तुमसे विदा हुए 
एक युग बीत गया।
आज तुम्हारी बहुत
याद आ रही है।
ये उठती -गिरती व्याकुल लहरें ,
मन को उद्वेलित कर रही हैं।
फेसबुक पर 
तुम्हारे प्रोफ़ाइल के
चित्रों में 
एक चित्र ऐसा लगता है,
मिलने की आशा सी जगाता है ,
जिसमें तुम परिवार के साथ हो,
ऐसे ही समुद्र के किनारे हो।
मैं चारो ओर नजर दौड़ा रहा हूँ
शायद तुम कहीं नजर आ जाओ।
एक झलक दिखा जाओ।
बहुत परिवार दीखते हैं।
अंग्रेज जोड़े तो
सौंदर्य की प्रतिमा से लगते हैं,उन से
बात करने को मन करता है।
परियों सी ,
श्वेतवर्णी ,कोमलांगी, 
बड़ी बड़ी आँखों वाली युवतियों को ,
देखने को दिल तो करता है ।
पर मेरी इनमें रुचि नहीँ।
मै तो यहां आए
भारतीय परिवारों में तुम्हें,
खोज रहा हूँ।
तुम्हारे परिवार को ढूँढ रहा हूँ ।
मन में ऊहापोह है कि
तुम मिल गयीं तो,
क्या पहचान पाओगी?
क्या मैं तुम्हें पहचान
पाऊंगा?
पहचान भी गए तो क्या
एक दूसरे से बात
कर पाएंगे?
सामने आने पर पहचान
कर भी क्या 
मुँह घुमाकर निकल जाएंगे?
या बात कर पाएंगे?
मैं अपनी पत्नी और
बच्चों को क्या बताऊंगा?
तुम को किस संबोधन से मिलवाऊॅगा?
तुम कौन हो?
क्या  परिचय है?
हम एक दूसरे को
कैसे जानते हैं?
तुम मेरे लिए कुछ  बता पाओगी 
अपने परिवार को?
या नज़र झुका कर ,
अजनबी सी बन जाओगी।
बहुत दुविधा है मन में ,
एक अजीब सी  बेचैनी भी तन में।
अचानक मुझे 
पानी की एक खाली
बोतल दिखायी देती है,
बोझिल मन को संबल देती है । 
जैसे आशा की कोई किरण दिखाई देती है ।
उसे उठाकर उलट -पलट कर देखने 
लगता हूँ ।
कुछ सोचने लगता हूँ । 
मन में एक ख्याल आ रहा है,
एक जा रहा है।
अचानक जेब से डायरी निकाल
उसके एक पन्ने पर अपना नाम
और पता लिखता हूँ।
तारीख और शहर का नाम
एक कोरे कागज पर लिखकर
बोतल में डाल देता हूँ।
अपनी कल्पना को पंख देता हूँ।
नाम, पते वाला कागज ऐसे
रखता हूँ कि
पढ़ा जा सके,
 समझा जा सके।
बोतल का ढक्कन 
बन्द करके ,कसके ,
फेंक देता हूँ उसे ,
उन उमड़ती लहरों में ,
पूरी ताकत लगाके।
यह कल्पना  करके,
कि कभी कहीं समुद्र के किनारे पर।
घूमती हो अगर ,तो शायद 
यह बोतल तुम से 
टकरा जाए ,काश ऐसा हो जाए, 
तो मेरे नाम और पते से अंदाज 
लगा लेना कि
मैं जहाँ भी हूँ,
बोतल छोड़ने की तारीख तक
स्वस्थ हूँ।
पर तुम्हें अब तक ,
भुला नहीं सका हूँ।
बोतल के रखे खाली
कागज से तुम्हें आज की तारीख
और जगह का पता 
मिल जाएगा।
कोरे कागज
में बंद मेरे मन के भाव-
विचार तुम खुद बाँच लेना।
कितना याद करता हूँ जान लेना।
तुम तो मेरे लेख से
मेरे मन के भाव जान जाती हो,
किस हालत में हूँ पहचान  जाती हो।
बोतल में रखे कागज से सब जान लेना,
पहचान लेना।
दिन छिपने लगता है,
तारे निकलने लगते हैं।
बच्चे और पत्नी भी
वापिस लौटने को
कहने लगते हैं।
मैं  भारी मन से 
अन्तिम बार समुद्र को
निहार , उठ जाता हूँ
मन में 
उससे विनती करता हूँ
कि मेरे नाम लिखी
बोतल तुम तक
गन्तव्य तक पहुंचा देना ।
जहां भी तुम हो।
जिस देश मे भी तुम हो।
जैसी भी तुम हो,
मेरा संदेश तुम तक पहुँचा देना।

एक पुरानी शर्ट

 सुखद अतीत का व्यतीत पल ,

अनायास जीवित हो गया ।
 कुछ  पुराने सामान की 
छॅटनी करते समय,
संदूक में रखी एक पुरानी शर्ट
 देखकर मैं चौंक गया।
लगभग 50 साल पुरानी शर्ट।
पीले, हरे रंग की , बड़े चेक की शर्ट,
पढ़ाई के समय की, मेरी प्रिय शर्ट!
पल भर में सब कुछ याद आ गया,
याद आ गया कि  यह शर्ट तो तुम्हें
भी बहुत पसंद थी।
मैं इसी शर्ट को पहनूँ ,
लंबे बाल रखूँ ,
तुम्हारी सदा इच्छा रहती थी।  
जीवन की सबसे प्यारी,
 पसंदीदा शर्ट!
 कब संदूक में रखी गयी ?
याद ही नहीं।
कैसे रखी गयी ? पता नहीं।
पचास  वर्ष, एक अर्धशतक ! 
व्यतीत  हो गया ,
अतीत की स्मृति  से मैं व्याकुल हो गया।
इतनी अवधि से रखी होने से ,
बुरी तरह मुस गई है।
जगह −जगह सलवटें पड़ गयी हैं।
इसका क्या दोष ? 
इस अंतराल में ,
 जाने कितनी शिकन चेहरे पर आ गयीं हैं।
शर्ट की शिकन  तो मैं देख रहा हूँ, 
 दर्पण नित्य देखने पर भी ,
चेहरे की शिकन से अज्ञात रहा हूँ ।
वे कब चेहरे पर आ जमीं?,
नयनों में आ गयी नमी ।
शर्ट  को उठाकर धीरे से,
उसे खोलता हूँ ।
झटक कर, हाथ फेरकर ,
सलवटें  हटाने की कोशिश करता हूँ।
किन्तु कमीज की सलवटें ,
यादों की परतें
हटाने  पर भी नही  हटतीं।
विगत को जीवंत  करने को 
लालायित  मैं,
 रह जाता हूँ असफल,
वे इतने  लंबे समय से 
रखे रखे  हो चुकी  हैं, 
भाग्य  सी निष्ठुर ।
नहीं खुलती  खोलने  पर भी।
ऐसे  ही तो मिट्टी ,
 कपड़ा, फल- पत्ते 
और मानव शरीर ,
लंबे समय पत्थरों में दब ,
बन जाते हैं  फोसिल्स  ।
शर्ट के स्पर्श का
 अहसास अकथ्य है ।
अतिप्रिय  होने से,
 वह कल्पना के योग्य है ।
अचानक उसकी ऊपर की जेब में,
हाथ डालता हूँ।
जेब में  कुछ कचरा सा मिलता है।
बाहर  देखता हूँ निकाल कर, 
चौंक पड़ता  हूँ देखकर ।
कचरा कुछ और नही,
मूंगफली के छिलके हैं।
 बहुत पुराने  छिलके ,
शर्ट के पहनने के समय के ।
जवानी के आलम के ।
और याद आ गयी वह कहानी,
तुम्हारे साथ बिताए, पल,
जो बीत चुका है, वह सुनहरा कल।
सब कुछ भूल, अतीत में चला गया,
याद आ गए , तुम्हारे साथ बिताए,
एक एक क्षण ,एक एक पल ।
मूंगफली के इन छिलकों को  देख ,
भूली यादें ,स्मृति  पर छा गयीं ।
मन को मधुर आभास करा गयीं ।
जब तुम और मैँ कॉलेज के लान में ,
‌डिटोनिया की एक झाड़ी के पास बैठे ,
खा रहे थे  मूंगफली।
छिलके इकट्ठे करते जा रहे थे,
  एक रूमाल पर।
कई दिन की छुट्टी 
और मौसम खराब होने के बाद,
काँलेज आज खुला था ।
सवेरे आसमान में ,
बहुत घना कोहरा था।
किंतु अब मौसम साफ था।
हलकी कुनमुनी धूप
 अच्छी लग रही थी।
शरीर को सुख दे रही थी।
आज कॉलेज में आवाजाही,
 बहुत कम थी ।
हमारे जैसे, कुछ जोड़े ही दिख रहे थे ।
धूप का आनंद ले रहे थे ।
कुछ अलसाए,
अपने में मस्त, प्यार में डूबे,
 एक दूसरे में खोए।
तुम मुझे और मैं तुम्हे ,
 खाने को दे रहे थे दाने , 
मूंगफली छीलकर ,
 एकत्र करते जा रहे थे,
मूंगफली के छिलके  ,
एक रुमाल पर ।
दोनों  पूरी तरह 
बातों में मस्त थे।
 एक दूसरे की 
आँखों में झाँकते, बातें
करते, खाते जा रहे थे ,
मूंगफली के बादाम जैसे टैस्टी दाने।
 मूंगफली खत्म होने को हैं,
ध्यान ही नहीं था ।
तुम्हारे चेहरे की
 मुस्कराहट का अर्थ,
नहीं  समझ पा रहा था,
अचानक तुमने झटके से 
रूमाल उठाया,
उसपर एकत्र किए छिलके, 
फेंक दिए मेरे ऊपर
उतार दिए मेरे कपड़ों पर।
और शरारत से हॅसती 
भाग गयीं कामन रूम में ।
आज पचास  साल बाद मिली ,
इस शर्ट की जेब में मिले,
मूंगफली के ये ‌छिलके ,
याद दिला गए उस घटना की ,
तुम्हारे साथ बिताए,
उन क्षणों की 
जिन्हें मैं भूल चुका था
बिसरा चुका था।