कुछ भी नही है वहाँ।
खाली है।
शून्यता का अहसास मन को
झकझोर देता है ।
दिल में यादों का लावा
पिंघलने लगता है ।
तुम्हारे संदेश की आशा अभी भी थी।
इसीलिए आज अपने पुराने
काँलेज आया था
शायद जीवन ने तुम्हे,
इधर आने की फुर्सत ही
नहीं दी।
मैं भी पाँच दशक बाद आज
अपने काँलेज
में आया हूँ।
अतीत में खोया हूँ ।
एक नजर चारों ओर डालता हूँ,
सब कुछ बदल गया है।
समय भी तो बहुत हो गया है ।
युवक- युवतियों के परिधान ,
माहौल,बात चीत का सलीका,
सब पर पाश्चात्य संस्कृति का
आधिपत्य है ।
हमारी पीढ़ी के विपरीत कृत्य है ।
आज युवक -युवती हाथों में,
हाथ डाले घूम रहे हैं।
आलिंगनबद्ध हो मोबाइल
में फ़िल्म देख रहे हैं।
बेइंतहा ,दीवानगी की हद तक
प्यार करने के बावजूद,
हमने सदा मर्यादा निभायी ।
सपने में भी
एक दूसरे को अँगुली नहीं लगायी ।
परिवर्तन की नदिया बहकर कहाँ से कहाँ पहुँच गयी।
मर्यादा की परिधि के तट तोड़ गयी।
रीडिंग रूम आज भी वहीं है,
जहां हमारे समय में था।
सब कुछ वैसा ही है।
बहुत बदलाव आया काँलेज में ,
पर यहां कुछ नहीं बदला।
सब पहले जैसा ही है।
कोने की टेबुल भी वैसी ही है,
जैसी हमारे समय में थी,
एक युवक – युवती बैठे हैं
आमने सामने।
किताब मेज पर खुली है
पर उसमें उनकी रुचि नहीं है।
किताब पर दोनों के मोबाइल
पड़े हैं ।
बस आपस में बातों में मस्त हैं,
मैं उनके पास से होकर निकल आया
उन्होंने ध्यान भी नही दिया।
दोनों अपने में मस्त हैं।
मैं रीडिंग रूम से निकल आता हूँ,
उस जगह जहां तुम मेरे लिए और मैं
तुम्हारे लिए पत्र छोड़ जाते थे।
हमारी वह गोपनीय जगह आज भी वैसी ही है।
अब तो उसमें काफी धूल जम गई।
अब युवाओं को पत्र लिखने
और भेजने की जरूरत ही नही रह गई ।
मोबाइल ने बहुत नजदीकी पैदा कर दी।
अब न पत्र लिखे जाते हैं
न भेजे जाते हैं। अब सीधे बात होती है।
हमारे समय में तो पत्र पंहुचाने वाले
विश्वसनीय मित्र खोजना भी एक जंग जीतना था।
अंतिम बार विदा होते समय तुमने कहा था।
कहीं भी रहो,
डायरी जरूर लिखना।
तुम बहुत अच्छा लिखते हो ।
लिखते रहना।
तुम्हारा यह वाक्य भुला नहीं पाया ।
यद्यपि नियमितता तो नहीं निभा पाया।
वक्त ने जब फुर्सत दी।
तुम्हारी याद ने बेचैन किया,
तब -तब लिखने का प्रयत्न किया ।
यह डायरी यहाँ
छोड़े जा रहा हूँ।
तुम्हे कैसे जिया ?
बिन तुम्हारे,
उन लम्हों को कैसे व्यतीत किया ?
सब इसमें है ।
कभी इधर आऒ तो
इसे ले जाना।
पढ़ सको तो पढ़ना।
नहीं तो कहीं जमीन में दबा देना।
कुछ दिनों बाद
गलकर खत्म
हो जाएगी।
इतना ध्यान रखना।
गंगा या किसी
नदी में मत फेंकना।
मेरे दर्द को महसूस
कर ये नदियाँ
ज्यादा कुनमुनाएगी।
बेचैन होंगीं।
जाने कितनों के प्रेम पत्र
इन्हें पहले ही परेशान
किये हैं।
गीतकार किशन सरोज
की प्रेमिका के पत्रों ओर चित्रों ने,
गंगा को पहले ही बहुत
दर्द दिए हैं।
वैसे भी भक्तों
ने घर की पुरानी मूर्ति,
हवन ,धूप- बत्ती की राख,
कूड़ा- कचरा भरकर इन्हें ,
पहले ही अपवित्र किया है।
प्लीज तुम ऐसा मत करना।
यह डायरी
जमीन में न दबा सको
तो मत दबाना।
किसी गटर में भले ही डाल देना।
पर नदियों में मत बहाना।
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