प्यार मत करो।
दोस्ती मत करो ।
तटस्थ रहो।
दुश्मनी करो।
जो चाहे करो।
मृदु कहो या
कटु कहो ,
बात होनी चाहिए ।
सिलसिला कभी नहीं
अवरुद्ध होना चाहिए ।
मीत हो तो प्रीत का ,
शत्रु बन कर शत्रुता का ,
निर्वाह होना चाहिए ।
क्रम कुछ तो इस प्रकार ,
चलता रहना चाहिए।
दरिया बहते ही पावन
रहता है।
जल स्वच्छ रहता है।
रुकने पर तो सड़ता है।
अतः रुको मत ,
चलते रहो ।
कुछ करते रहो।
करना और गति ही ,
जीवन की पहचान है।
नहीं तो जिंदा और
मुर्दा एक समान है।
No comments:
Post a Comment