Thursday, 5 September 2024

तुम क्या हो मैं नहीं जानता

  तुम क्या हो मैं नहीं जानता।

दुनिया तुम्हें जो कहती है,
मेरा मन तुम्हें वह नहीं मानता।
तुम वह नहीं हो।
कोई तुम्हें चांद कहता है।
कोई ऑखों का तारा ।
मेरी नजर में,
न तुम चांद हो।
न तो सितारा।
तुम तो हो अलग ,
इन सबसे पृथक।
चांद, सितारे तो निद्रा के कारक हैं।
आलस्य का नाम हैं।
आराम की  धरोहर हैं।
सुस्ती की पहचान हैं।
किंतु  तुम ऐसी नहीं हो।
इनसे विपरीत हो ।
छाया  सी शीतल ,प्रकाश सी कोमल ।
तुम्हें क्या कहूँ?
सूर्य की पहली किरण।
उषा, भोर या प्रथम रश्मि की लालिमा ? 
तुम्हारे आने की बेला में,
प्रकृति झूमने लगती है।
गाने लगती है।
आनंद मनाने लगती है।
फूल ख़िलने लगते हैं।
कलियाँ चटकने लगती हैं।
पक्षी गुनगुनाने लगते हैं।
पेड़- पौधे स्वर्णिम प्रकाश में,
नहाने लगते हैं।
संसार की दिनचर्या शुरू 
होने लगती है।
स्फूर्ति  जागती है ।
प्राणी बिस्तर त्यागने लगते हैं।
आलस्य  होता है विलीन ।
जीवन होता है गतिशील।
शांत रास्ता और पगडंडियाँ ,
होती हैं कोलाहलमय। 
जीवंत हो उठता है संसार ।
इसीलिए कहता हूँ तुम 
चांद नहीं  हो।
तारे भी  नहीं हो।
तुम तो कुछ और हो।
 सब से अलग ,
जीवनदायिनी प्रकृति की ।
ऊर्जा सृष्टि की।
पहली किरण सूर्य की ।
भोर का उजाला सी 
उषा की सिन्दूरी आभा सी।

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