तुम क्या हो मैं नहीं जानता।
दुनिया तुम्हें जो कहती है,
मेरा मन तुम्हें वह नहीं मानता।
तुम वह नहीं हो।
कोई तुम्हें चांद कहता है।
कोई ऑखों का तारा ।
मेरी नजर में,
न तुम चांद हो।
न तो सितारा।
तुम तो हो अलग ,
इन सबसे पृथक।
चांद, सितारे तो निद्रा के कारक हैं।
आलस्य का नाम हैं।
आराम की धरोहर हैं।
सुस्ती की पहचान हैं।
किंतु तुम ऐसी नहीं हो।
इनसे विपरीत हो ।
छाया सी शीतल ,प्रकाश सी कोमल ।
तुम्हें क्या कहूँ?
सूर्य की पहली किरण।
उषा, भोर या प्रथम रश्मि की लालिमा ?
तुम्हारे आने की बेला में,
प्रकृति झूमने लगती है।
गाने लगती है।
आनंद मनाने लगती है।
फूल ख़िलने लगते हैं।
कलियाँ चटकने लगती हैं।
पक्षी गुनगुनाने लगते हैं।
पेड़- पौधे स्वर्णिम प्रकाश में,
नहाने लगते हैं।
संसार की दिनचर्या शुरू
होने लगती है।
स्फूर्ति जागती है ।
प्राणी बिस्तर त्यागने लगते हैं।
आलस्य होता है विलीन ।
जीवन होता है गतिशील।
शांत रास्ता और पगडंडियाँ ,
होती हैं कोलाहलमय।
जीवंत हो उठता है संसार ।
इसीलिए कहता हूँ तुम
चांद नहीं हो।
तारे भी नहीं हो।
तुम तो कुछ और हो।
सब से अलग ,
जीवनदायिनी प्रकृति की ।
ऊर्जा सृष्टि की।
पहली किरण सूर्य की ।
भोर का उजाला सी
उषा की सिन्दूरी आभा सी।
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