Thursday, 5 September 2024

कविताएं

 

अशोक मधुप की कवितांए

मीत तुमने अभी पढ़ा क्या है,

मेरी आँखों को पढ़के देखो तो।

ये दुनिया बहुत सिखाएगी,

बस,घर से निकलके देखो तो।


-जिंदगी सुबह हुई, दिन हुई ,शाम हुई,

लो एक ज़ुस्तज़ु फिर तुम्हारे नाम हुई।

जो कल तक छिपी थी फसील के पीछे,

वो कहानी ,चलो आज सरे आम हुई।

-अशोक मधुप

फसील - दीवार

−−−−

जय जय राम रमैया जी,

यूपी वाले भैया जी !

शहर-शहर गौशाला जब,

सड़कों पर क्यों गैया जी।

अधिकारी तो सुनते ना,

सूखे ताल- तलैया जी।

 अब प्रधान ही  लूट रहे,

जमकर माल मलैया जी।

ये कलजुग है होगा सब,

तू क्यो रोवे भैया जी ?

सारे चौकीदार यहाँ ,

फिर क्यों डूबी नैया जी ?

देख जमाने की लिप्सा,

रोवे नोट रुपैया जी।

सब मस्ती में मस्त हुए,

सबकी ताता थैया जी।

मैं भी लूटूं, तू भी लूट,

मत चिंता कर भैया जी।

−−−−


पुराने अंदाज में-

चेहरे पर थकान लगती है।

जिंदगी परेशान लगती है।

मियां वो इतनी खूबसूरत है,

पूरा लट्ठे का थान लगती है।

-अशोक मधुप

 

एक छोटा सवाल है बाबा,

कैसा सबका हाल है बाबा।

अब घर से निकलना ठीक नहीं ,

ये करोना का साल है बाबा,

जाने कितनों को लेके जाएगा,

जाने कितनों का काल है बाबा।

हमतो घर में छुपके बैठे हैं,

ये समय की चाल है बाबा।

सब  अब तो बचके चलते हैं,

बस इतना  मलाल है बाबा !

खुशी-गम बांटने पर पाबंदी ,

देखो कैसा कमाल है बाबा !

 

−−

समझो ना, समझाओ जी,

बातें फकत बनाओ जी।

नौकर तुम सरकारी हो,

रिश्वत खूब उड़ाओ जी।

काम धाम का क्या करना ?

फाइल बस टरकाओ जी।

अधिकारी भी लूट रहे हैं,

तुम भी लूटो खाओ जी।

अपना कुछ कर्तव्य नहीं है,

सबको ये बतलाओ जी ।

सब गलती सरकारी है,

ये आरोप लगाओ जी।

−−−

: मॉल रहे या माले जी।

 रुके नहीं घोटाले जी।

गंगा ही बस पावन है,

दूषित नदियाँ, नाले जी।

उनके घर पकवान बने हैं,

इनके रोटी-  लाले जी।

कुछ गलती तो थी अपनी,

क्यों ये विषधर पाले जी?

नेता जी के दमपर ही

खुश हैं साली - साले जी।

योगी मोदी अच्छे हैं,

अधिकारी मतवाले जी।

नए -नए हथकंडों से ,

करते काम निराले जी।

फाइल पैसे से चलती,

 कैसे  काम निकालें जी।

आओ बैठो सोचें कुछ,

बिगड़ी बात बनालें जी।

 क्या लाये या ले जाएंगे ?

 मन को ये समझालें जी,

बुरा समय आया था कल ,

भाग गये हमप्याले जी।

−−−

मुझको न दिल्ली भाती है

  ना दिल्ली दरबार सखे!

मुझको बस अच्छा लगता है,

अपना घर और द्वार सखे!

ये नगरी पैसे वालों की,

नगरी यह धनवानों की,

मुझको भाते बस बिजनौरी,

बिजनौरी हैं यार सखे!

चाहे कितनी घूमूँ दुनिया,

चाहे कितना सफर करूँ।

मन रमता बिजनौर में आकर,

ये बिजनौरी प्यार सखे !

कहीं जाकर न मन मिलता है,

 ना ही मिलता है अपनापन ।

 बिजनौर ही है दुनिया अपनी ,

ये ही बस स्वीकार सखे !

जंगल से ये शहर लगे हैं,

बियाबान सी काँलोनी ।

सब अपने में मस्त यहाँ है,

इनका पैसा प्यार  सखे।

यहां सड़क पर भी पहरा है,

गली -गली  फैला कोरोना।

साँस यहां लेना दुष्कर है,

 है विषभरी  बयार सखे !

यहां दौड़ ही दौड़ मची है,

यहां दौड़ ही जीवन है,

तुमको ही ये रहे मुबारक,

 बेमुरव्वत  संसार सखे।

मेरे शहर में प्यार मिलेगा,

और  मिलेंगे दिलवाले,

तुम  तो राजा हो ,भूलोगे,

भूलोगे ये प्यार सखे,

पूरा शहर लगे है अपना,…

अशोक मधुप

−−

बात सुनाऊँ पक्की जी

है ये बिल्कुल सच्ची जी।

अब बबुआ पूरा लगता,

मीत हमें तो झक्की जी।

मित्रों पर विश्वास करो,

मत हो ज्यादा शक्की जी।

खबर न छापो उल्टी तुम,

कर देंगे वो नक्की जी।

अशोक मधुप

−−−

: मत समझो ,समझाओ जी।

पलकें झुकीं ,उठाओ जी ।

बड़ी रँगीली है दुनिया,

इंद्रधनुष बन जाओ जी।

−−

:वाट लगादो तन की जी,

वाट लगादो धन की जी,

मर्जी से जीना सीखो,

सुनलो अब तो मनकी जी।

जग की सोची,जग की मानी,

दुनिया ने भरमाया जी,

अपनी  कोई चाह नहीं थी,

फिर भी तन सजवाया जी,

हम थे एकतारे के रसिया,

तुमने ढप्प बजवाया जी।

हम देहाती सीधे सादे,

न जाने जग की बतिया,

तुमने ही भरमाया हमको,

तुमने सेन चलाया जी।

बहुत बने हम अगले पगले,

 बहुत बने  दीवाने हम,

हम को शायर ही रहने दो,

क्यों तुमने भरमाया जी ?

अपनी कोई चाह नहीं थी,

 न मनकी कोई तृष्णा,

हमको प्यारी बस राधा थी,

हमको प्यारे थे कृष्णा,

क्यों जग का मुजरा सजवाया?,

क्यों ये पाप कराया जी?

अशोक मधुप

 

सब जगह गबन है भैय्या,

चहुं ओर घोटाले हैं।

जानबूझ कर चुप हैं आका,

सबके मुंह पर ताले हैं।

 गर ज्यादा शोर करोगे तो,

प्यारे ! मारे जाओगे ।

बेईमानों ने अपने चमचे,

औ कुछ गुंडे पाले हैं।

 बहुत कमाया है पैसा पर ,

इनके पास नहीं कौड़ी ।

सबकी मालिक पत्नी इनकी,

शेष बचे के साले हैं।

−−

बात रंगने की थी गुलाबों को,

रंग गए खार क्या किया जाए?

दोस्त अमृत कहीं मिलेगा नहीं,

आऒ, बैठो जहर पिया जाए।

बरसों बीते नहीं मिला उत्तर,

आस में कब तलक जिया जाए?

गलतीं तेरी हों या किसी की हों,

दोष किस्मत को बस दिया जाए।

दोस्त ही  बन गए हैं कातिल जब,

संग नागों के ही जिया जाए ?

आज तो  कांटे  हैं सगे अपने,

तेरे फूलों का क्या किया जाए?

−−

: जो भी करलो जल्दी कर लो,

 गिनी चुनी बस सांसे हैं।

जीते जी के सब किस्से हैं,

पीछे खील बताशे हैं।

मत भरमाओ यौवन पाकर,

चार दिनों की बेला ये ।

जीवन है शतरंज की बाजी,

उल्टे सीधे पांसे हैं।

 

कौन आया था कल मिलने -मिलाने पथ पर?

 कौन आया था  कल सपने जगाने छत पर?

कल गया था हमें छोड़ के तन्हा -तन्हा

   चाँद आया   है वो चलके किरण के रथ पर।

अबकी रक्षबन्धन सब ऐसे मना रहे हैं।

न बहन आ रही है,न भाई जा रहे हैं।

कोरोना ने पूरी दुनिया में क्या तबाही मचाई है।

हर बार राखी लेकर बहिन आती थी।

  इस बार  राखी डाक से  आई हैं।

सब के अपने स्वार्थ हैं,सबकी अपनी प्रीत।

: कोई तो आ के  बतलाओ,रातरानी  किधर से आई है?

रोम- रोम सिहर गया अपना ,

किसने उॅगली जरा छुआयी है ?

-अशोक मधुप

 आज मौसम में है कुछ ठंडी सखे!

जैसे बीती ,बीती,बस बीती सखे!

युद्ध में होता नहीं कुछ भी गलत,

जंग जीती,जैसे भी,जीती सखे!

खूब अमृत पान जीवन भर किया ,

प्यास तो फिर भी रही रीति सखे!

:

−−−−−−−−−−−−−−−−−−−−−

 एक दिन बीत गया,एक दिन और।

जीवन जंग जीत गया,एक दिन और।

 तकदीर में नहीं था,कर्म ने दिया,

मुंह से छिटक गया रोटी का कोर।

−−−−−

कोरोना पर कविता

 यार दोस्तों से घिरे रहने वाले

मोहन ने आत्म हत्या कर ली।

जिसने सुना ।

हक्का बक्का रह गया।

मोहन के घर पर

भीड़ लग गई।

इतने हँसमुख मस्त रहने वाले

की आत्म हत्या का

सब कारण जानना चाहते थे।

पुलिस आई।

पंखे से शव

उतारा।

तलाशी ली।

जेब मे रखे पर्चे पर

लिखा था।

कोरोना से मरना पसन्द नही था।

नही पसन्द था

अपने भी पास आते बचें।

आखरी वक़्त में तो अपने

साथ रहें।

सब साथ रहें

इसलिए मर रहा हूँ।

आत्महत्या कर रहा हूँ।

अशोक मधुप

दे-दे के घाव ,तुरपना- सीना सीखा दिय।

पीते नहीं थे, आपने पीना सीखा दिया।

खतरों में बांह छोड़कर चलते गए सभी,

हमको अकेले वक्त ने जीना सीखा दिया।

 

: ख्वाब कुछ पलक से उतरकर चले गए।

कुछ दोस्त मेरी जेब कुतरकर चले गए।

पूरा था लॉक डाउन,सब ट्रेन ,प्लेन बन्द,

कोई बताये कैसे,वो अपने घर चले गए।

−−

मत समझो ,समझाओ जी।

पलकें झुकीं ,उठाओ जी ।

बड़ी रँगीली है दुनिया,

इंद्रधनुष बन जाओ जी।

-अशोक मधुप

खूबसूरत  सा ख्बाब देखा है।

एक हसीन  मेहताब देखा है।

तुमने देखा नहीं ,तुम्हे क्या पता?

हमने खिलता गुलाब देखा है।–

−−

बात सुनाऊँ पक्की जी

है ये बिल्कुल सच्ची जी।

अब बबुआ पूरा लगता,

मीत हमें तो झक्की जी।

मित्रों पर विश्वास करो,

मत हो ज्यादा शक्की जी।

खबर न छापो उल्टी तुम,

कर देंगे वो नक्की जी।

−−

बहुत लड़ाई हुई मीत, पर नहीं किसी की मानी।

 प्रिय रही सबसे अधिक,हमको निंदिया रानी।

: मित्रों! बेकार के चक्कर छोड़ो,

समय ठीक न देख ,मौन हो जाओ।

मी टू के दौर में, खैर मनाओ।

बेहतर है  भक्ति में लग जाओ।

प्रभु में पूरा ध्यान लगाओ।

हारमोनियम बजाओ।

अनूप जलोटा बन जाओ।

बिना चाहे आपको रिझाने,

फिर मेनका और रंभा आएंगी।

वे स्वर्ग की परी बनकर ,

आपके साथ आनन्द मनाएगी।

जसलीन की तरह ध्यान लगाएंगी।

कोई मी टू करे आप मत पिंघलना

अंतर मोम भले ही हो पर ,

दिखाई एक दम बजरंगबली देना।

अशोक मधुप

सुबह ,शाम तक आते -आते बूढ़ी हो जाती है।

एक पगली रोज सवेरे जाने क्या गाती है?

तुझको राजमहल भाते हैं, यह तेरी मर्जी,

मुझको अपनी छोटी सी कुटिया ही भाती है।

− जिंदगी सुबह हुई, दिन हुई ,शाम हुई,

लो एक ज़ुस्तज़ु फिर तुम्हारे नाम हुई।

जो कल तक छिपी थी फसील के पीछे,

वो कहानी ,चलो आज सरे आम हुई।

-अशोक मधुप

फसील – दीवार

−−

: मीत तुमने अभी पढ़ा क्या है,

मेरी आँखों को पढ़के देखो तो।

ये दुनिया बहुत सिखाएगी,

बस,घर से निकलके देखो तो।

−−

 

: हमसे तो अच्छा है पगला

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देखो कितना कुछ है बदला

जवानी बदली

बचपन बदला

तुम न बदले

मैं ना बदला

यह तो बिल्कुल

साफ- सही है

दिल में है यादों का डेरा

तुम कहते हो

मंजिल पा ली

हमने पूछा कब हुआ सवेरा ?

रात घनेरी ,चंदा उजला

दुनिया सुख-दुख का मेला

दर्द, ग़मों को

भूल गया है

हमसे तो

अच्छा है पगला

जीवन की डगर होती अनजानी

राह चलता, राही भूला

पर कभी कोई अनजाना

संबल बन आ जाता है

आशा की किरण जगा जाता है

ऐसे ही पथ भटके पथिकों को

उन लोगों ने लिया संभाला जिनका

श्यामल तन था पर मन था उजला

अभी भर आयीं हैं आंखें

पोंछी तो ऑचल है गीला

बहुत दिनों में छत पर दीखा

इक छोटा सा काला बदला

मन शतदल कुम्हला गया है

कब बरसेगा ? कुछ आस जगी है

लगता तो  आकाश है धुंधला।

 

- अशोक मधुप

महकाएंगे मेरा आगंन

 

...........

 

कुछ बच्चे मुहल्ले के

 

मेरे पास आए

 

मुझे दे गए फूलों का एक गुलदस्ता।

 

कह गए - हैप्पी बर्थ डे दादा जी।

 

छोटे -छोटे बच्चे ।

 

अलग -अलग रंग के मोहक वस्त्रों में ,

 

खुद ही नजर आ रहे थे,

 

 रंग ब‌िरंगे  फूल।

 

इनमें से चाहे

 

किसी को  जूही कहो या चंपा,

 

चमेली मानो या हरसिंगार,

 

उनके अलग -अलग रंग के

 

 मोहक वस्त्रों की

 

अलग- अलग खुशबू।

 

मुझे अंदर तक कर गई मोहक- मुग्ध।

 

और मै हाथ में लिए गुलदस्ता,

 

उन्हें जाते देखता रहा।

 

वह चहचहा रहे थे,

चिड़ियों की तरह,

गुनगुना रहे थे

 

भंवरों की तरह।

 

उनके जाने के बाद

 

मैने  देखा गुलदस्ते को ,

 

उसके फल और पत्तो ंको।

 

वे बहुत खूबसूरत नजर आ रहे थे।

 

रंग बिरगे फूलों को

 

छूने का बहुत मन हुआ,

 

पर इस डर से नहीं किया स्पर्श ,

 

कि कहीं छुई मुई की तरह ,

 

मेरे छूते ही ये मुरझा न जांए।

 

गुलदस्ते के फूलों में

 

गुलाब के फूल और

 

पत्ते  तो बहुत  थे ,

 

नहीं  थे तो कांटे।

 

लगा हमने गुलाब को

 

प्यार और दुलार कर

 

इस तरह बना लिया

 

 कि वह आदमी से

 

 सुरक्षा के लिए

 

फूलों के  चारों   कांटे बढ़ाने की

 

 प्रवृति भूल गया।

 

इंसान का प्यार पाकर

 

अपने अवगुण त्याग ,

 

सुगंधि देने का

 

गुण ही विकसित कर लिया।

 

मैंने इस गुलदस्ते को

 

एक खाली गमले में

 

लगाकर रख दिया

 

कमरे के एक कोने में।

 

फूलों को हरा भरा

 

 रखने के लिए

 

भर  दी गुलदस्ते की जड़ में खाद ,

 

देने लगा पानी।

 

बाजार से खरीदारी कर

 

 लौटी पत्नी बोलीं-पागल हो गए हो,

 

गमले में लगाए फूल

 

असली नहीं,नकली हैं।

 

पानी और खाद कितना ही दो,

 

बढ़ने वाले नहीं हैँ।

 

पत्नी ने कुछ भी नहीं सोचा-

 

 एक बार में इतना कुछ कह गईं।

पर मेरा मन  उन्हें

 

नकली  मानने को तैयार नहीं था।

 

 मुहल्ले के छोटे छोटे फूलों द्वारा

दिए गए उपहार को

 

मैं कूड़े में तो नहीं फेंक सकता था।

 

उन्हें कचरे में तो नहीं डाल सकता था।

 

किसी को जूतों तले कुचलने के लिए

 

सड़क किनारे तो नहीं

 

फेंक सकता था।

 

अब खाद पानी लगने पर भी

 

  ये विकसित हों न हों ,

 

ये इनकी प्रवृति।

 

मुझे तो  इनकी जड़  में

 

 पानी और खाद देना है,

 

इस आशा में ,

 

 विश्वास की  इस  किरण के साथ,

 

कि ये बढ़ेंगे,बहुरेंगे,

 

और देंगे नए फूल,

 

नई  खुशबू, नई सु्गंधि,

 

महकाएंगे मेरा आगंन,

 

मुहल्ले के बच्चों की तरह।

--अशोक मधुप

"एक विज्ञापन ऐसा भी"

      हास्य व्यंग्य

---

जरूरत है एक

अदद साली की।

बिना बहिन वाली की ।

क्योंकि हमारी पत्नी की ,

छोटी बहिन बनना होगा ।

रिश्तों को उसके साथ भी तो ,

निभाना ही होगा ।

उम्र 25 ,30 साल।

सुन्दर, स्लिम,अविवाहित।

जाति बंधन नही।

डॉक्टर,सरकारी,अधिकारी

एम.बीए को प्राथमिकता।

सेलरी बढ़िया हो,

जो बुढ़ऊ पत्रकार  का खर्च

उठा सके।

फाइव स्टार होटल में खाना

खिला सके।

ऑडी में घुमा सके।

महानगर में अपना मकान

जरूरी।

कई महानगरों  में मकान

हों तो क्या कहने?

उसकी और उसकी सम्पत्ति की ,

देखभाल की पूरी जिम्मेदारी हम उठाएंगे ।

तनिक भी कष्ट न हो ,साथ बखूबी निभाएॅगे।

बाल सफेद ऐसे ही नहीं हुए हैं,

वर्षों के अनुभव का नतीजा है,

बहुत से छोटे -बड़े हम से ,

लाभान्वित हुए हैं।

मेधावी, योग्य प्रतिभागी को ही ,

साक्षात्कार के लिए निमंत्रित किया जाएगा ।

सब अत्यंत गोपनीय रखा जाएगा।

सीधे मिलना ,सिफारिश करवाना ,

अयोग्यता माना जाएगा।

हम भी तो कितना महत्वपूर्ण योगदान देंगे ।

अपनी योग्यता, अनुभवों का,

समस्त ज्ञान उसे देगे।

यह कोई सरल कार्य नहीं है ,

आवेदन की अंतिम तिथि ,

नियमावली  अभी नीचे लिखी है ।

पढ़ लेना, आवेदन

 कमसे कम 20 फोटो के साथ करें 

 फोटो अलग- अलग कोण से,

अलग अलग पोज में होने अनिवार्य।

जिससे हमें सुविधा  हो और

आपको भी किसी प्रकार की,

न कोई भी दुविधा  हो ।

 

अशोक मधुप

18/12/2021, 12:52 am - Ashok Ji: एक अंगडाई लो सुस्ती त्यागो मित्र जागो

,,,

 

तुम उदास हो, रो रही हो,

 

तुमने पति खोया है।

 

वक्त ने तुम्हारे जीवन में विष बीज बोया है।

 

जीवन पथ पर तुम्हें सहारा देने वाले,

 

अब वो मजबूत हाथ  नहीं रहे ।

 

45 साल साथ साथ  चलने वाले

 

अब वह तुम्हारे साथ नहीं रहे।

 

अब तुम अकेली हो, परेशान हो,

 

उनको याद कर अपना

 

आपा खो देती हो,

 

बात बात पर जब -तब रो देती हो,

 

तुम्हारी पीड़ा को वही जान सकता है,

 

जिसका जीवन संबल गया हो,

 

सहारा  खोया हो,

 

होठों की  मुस्कान गई हो,

 

मांग का  ‌सिंदूर छिना हो,

 

जीवन का हीरों गया हो,

 

जो जार जार रोया हो,

 

जिसने जीवन  का संबल खोया हो ।

 

एक बात बताओ,

 

क्या ऐसा पृथ्ची पर पहली बार हुआ है,

 

क्या इससे  पहले लोगों ने जीवन साथी

 

अपने ‌प्र‌िय को नहीं गवांया।

 

क्या यह दुख तुम पर ही पहली बार आया ।

 

तुम पर यह दुख आया,

 

तुम रो रही हो,

 

उदास हो, जीवन से निराश हो।

 

किंतु यहां तो कोई भी अमर नहीं है,

 

जो आया है, उसे जाना है,

 

जाकर फिर नए रूप में   आना है।

 

ये  जीवन चक्र है, चलता ही रहेगा,

 

जो पृथ्वी पर आया,  वह किसी न किसी

 

प्र‌िय की मृत्यु

 

का दुख, दर्द  जरूर सहेगा ।

 

किसी का भाई, जाएगा तो किसी का बेटा,

 

किसी की पत्नी विदा होगी तो किसी का प्रेमी।

 

और फिर  किसी -किसी के यहां

 

बेटा आएगा तो किसी का भाई।

 

कहीं रोना होगा तो कहीं  गाना्,

 

कहीं मातम ‌होंगे  तो कही खुशी।

 

यही तो है  जीवन चक्र  ,

 

समय का पहिंया।

 

आज वह गए हैं, कल कोई और जाएगा,

 

किसी न किसी द‌िन तुम्हारा

 

और हमारा नंबर भी आएगा।

 

सबके नंबर लगे हैं,

 

डेट फिक्स है,

 

किसी की फोर है,

 

तो किसी की सिक्स है।

 

यह कर्म भूमि है,

 

जिसका जबतक कर्म बकाया है,

 

तब तक हर हाल में रहना है।

 

जीते जी नई खुशी पर आनन्द  मनाना है,

 

   ‌हर प्रिय के जाने का दुख उठाना है।

 

रावण बध के बाद राम को राज नहीं करना था,

 

कार्य समाप्ति पर वापिस जाना था,

 

महा भारत का कार्य  निपटाकर

 

कृष्ण को भी प्राण गवांना था।

 

यहां सब कुछ एक क्रम में बंधा है, नियति नि‌श्च‌ित है,

 

काम समय निर्धारित हैं।

 

क्रम तै हैँ।

 

समय चक्र जारी है,

 

हां पति के निधन की पीड़ा

 

तुम पर जरूर भारी है।

 

पर जीवन चक्र चलता रहता है,

 

किसी के खो जाने से नहीं रूकता।

 

कोई  भी पूर्ण  जीवन साथ नहीं चलता।

 

ये ट्रेन का सफर हो।

 

कोई कुछ देर  बाद

 

अपनी यात्रा पूरी कर ट्रेन से उतर जाता है।

 

कोई   गंतव्य तक हमारे साथ जाता है।

 

पूरे समय कोई  साथ नहीं देता,

 

कोई हर वक्त ,हर पल साथ नहीं रहता।

 

अंधेरे में हमारी छाया भी

 

हमारा साथ छोड़ देती है।

 

जीवन पथ में रोज साथी मिलते हैं,

 

रोज मौत  उन्हें हर लेती है।

 

 जो हुआ,उसे बिसराओ,

 

आओ कुछ नया करने

 

नए मित्र  बनाओ।

 

यहां जो तुम्हारा कार्य

 

शेष है, उसे पहचानो।

 

 जीवन जीने के लिए

 

नए  संकल्प ठानो।

 

दुखद स्वपन भूलो,

 

मित्र समझो, जग जाओ,

 

तुम्हें अपने परिवार

 

मित्रों के  लिए जीना है,

 

जीवन में पान करने को

 

जाने अभी कितना विष शेष है,

 

जाने कितना  और

 

हलाहल पीना है।

 

अपने शेष कार्य करने पर लग जाओ,

 

मित्र,

 

 जग जाओ।

 

एक अंगडाई लो सुस्ती त्यागो,

 

नया कार्य करने को

 

 पूरी ताकत से लग जाओ |

 

अशोक मधुप

 

यह टेम्पा है हुजूर।

अमेरिका के फ्लोरिडा प्रदेश

का बड़ा औद्योगिक नगर।

बसा है समुद्री किनारे पर।

प्रकृति का खिलौना सा ,

हरियाली से भरपूर ।

वन-प्रदेश का  है विस्तार

स्वच्छ, बयार ।

विविध  जीवजंतुओं  की

क्रीड़ा- स्थली,

मृग की चौकड़ी ,

मनमोहक लगती है ।

प्रातःकालीन नील गगन,

उसमें विचरण करते श्वेत शावक से घन।

नयनाभिराम  दृश्य,

 विस्मित  मन और,पुलकित  तन।

गर्मी यहाॅ भी दिल्ली सीै है ।

पर जलवायु में अंतर है ।

सवेरे सामान्य सा लगता मौसम,

दोपहर होते ही,

छाने लगते हैं सघन घन ।

रुई के गोलों से कोमल।

तीन -चार बजते-बजते ,

नभ को आच्छादित करते ।

गहरी काली घटाएॅ,

 और  शीतल हवाएॅ ,

खूब चमकती बिजली,

होने लगती है वर्षा ।

ईश्वर का ये कैसा चमत्कार, !

प्रकृति  का यह रूप अपार!

रात में हो जातें हैं  ,

बादल साफ।

नभ कर लेता ,तारावलियों का श्रृंगार।

नित्य यही होता ,

मेघ और  धरा का प्यार ।

अशोक मधुप

अमर उजाला काव्य में प्रकाशित मेरी कविता

22/12/2021, 7:45 am - Ashok Ji: शीत ऋतु है , माना कि

बहुत ठंडी है पर ,

क्यों डरते हो?

गर्मी भी तो बहुत  सही है ।

अब ठंड का भी स्वागत करो।

घर के द्वार खोलदो ।

बाॅहे फैलाओ।

आनंद  उठाओ ।

मक्का की रोटी ,चने का साग,

खूब सारे मक्खन के साथ पाओ

गाजर का हलुआ और

मूंगफली, गुड़पट्टी खाओ ।

हो सके तो हमें भी भिजवाओ।

सर्दी भी लाजवाब है ।

इसे सदा तो

रहना  नहीं है।

कुछ दिन बाद

 बदलेंगे हालात।

बसंत ऋतु आएगी ।

हर्षोल्लास भर जाएगी ।

सर्दी खुद भाग जाएगी।

-अशोक मधुप

 

 

 

 

 

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