मैं सोने जा रहा हूँ
आऒ सिरहाने बैठ जाओ।
मैं जब बेचैन हूँ,
कुछ गुनगुनाने बैठ जाओ।
कभी तन्हाई डसती है,
अकेलापन भी खलता है,
रहो खामोश मत,
सुनने -सुनाने बैठ जाओ।
हवा बहकी हुई सी हो,
हो मौसम भी आवारा ,
इन शरारती ऑखों से,
पिलाने को बैठ जाओ।
तुम्हारी रेशमी जुल्फ़ें तो ,
सावन की घटाएं है ,
जुल्फ़ों को मेरे मुख पर,
बिखराने को बैठ जाओ ।
अशोक मधुप
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