चांद ने कहा ,जागो मेरे साथ।
कितनी सुहानी है रात ।
चारों तरफ खिली चाॅदनी है ,
धवल दुग्ध सी छनी है ।
मैंने कहा -चाहता तो हूँ,
अनुपम है छटा ,मानता हूॅ।
नदी किनारे बैठना चाहता हूॅ।
उसके जल में पाॅव डालना चाहता हूॅ।
नदी- किनारे शीतल रेत में बैठ कर ,
तुम्हें रात भर अपलक निहारना भी चाहता हूॅ ।
चाॅदनी को नयनों में भर लेना चाहताहूॅ,
पर आज समय नहीं है।
जीवन ने कभी अवसर दिया
तो जरूर ऐसा करूँगा।
आज यह संभव नहीं है,
आज तो जमकर सोना है।
किसी के सपनों में खोना है ।
किसी का यह वादा है।
उसका सपनों में आने का इरादा है ।
आज तो उसका इंतजार है।
यह दिल बेकरार है ।
तुम्हें फिर कभी बाद में निहारूँगा
और चाॅदनी को भी बाॅहों में भर लूॅगा1
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