Thursday, 5 September 2024

चाँद से मैं कहने लगा

 इक दिवस, चाँद से  मैं कहने लगा ।

क्यों तू प्रियजनों को वेदना देने लगा ?
चाँद बोला -मुझे क्यों दोष देते हो ?
चाँद तो बेकसूर है ।
उज्ज्वल चाँदनी उसका नूर है।
जग को शीतलता देता है ।
उसकी पीड़ा को हरता है।
 विरह -वेदना के आँसू लेकर,
फूलों को दे देता है ।
उनको खिलता -मुस्कुराता देखकर ,
हर्षित  होता है ।
फिर चला जाता है, परदेस ,
वहाँ पर देता है संदेस ,
मित्रों के स्नेह और ममत्व का, 
उमंग भरे मिलन का ।                      
सुगंध उनके देश की माटी की ,
यादें पूनम की रातों की।
चाँद को मीत बनाओगे तो ,
परदेस में भी उसके दर्शन पाओगे।
 गगन में उसके आलोक से ,
अपनत्व की प्रतीति होगी।
चाँदनी की शीतलता से ,
सुखद अनुभूति होगी। 
विदेश में उस से बढ़ कर ,
नहीं कोई विभूति होगी।

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