ऐसे गंभीर न होओ
मस्त रहो, शाद रहो।
दोस्त ज़हां भी रहो,
खुश रहो, आबाद रहो।
मै अजीब सी कशमकश में हूँ।
जहाँ भी भीड़ होती है।
उसमें उलझ जाता हूँ।
कहीं खो सा जाता हूँ ।
लोग कहते हैं ,कि मैं उस भीड़ में ,
बोरा सा जाता हूँ।
कुछ चेहरे खोजने
लगता हूँ,उन बेगानों में
कुछ अपने खोजने
लगता हूँ।
कुछ भूले-बिसरे सपने
देखने की कोशिश करता हूँ।
याद करने लगता हूँ।
अपने में परिवर्तन सा अनुभव करता हूँ ।
अतीत को दोबारा दोहराना चाहता हूँ ।
कुछ मीठी यादों की कसक है,
जिन्हें भुला नहीं पाता हूँ ।
मुझे बहुत सुनने की,
आदत हो गई है।
बहुत कुछ सहना स्वभाव बन गया है ।
क्यों चुप रहना भाने लगा है ?
अतीत अब क्यों सताने लगा है ?
शायद मैं अब मन से ,
दुर्बल और भावुक हो गया हूँ ।
आयु का यह पड़ाव ही ,
इस विवशता का कारण है ।
जब कुछ छूटने सा लगता है,
मन अशांत होने लगता है ।
मोह के बंधन सशक्त होने लगते हैं।
अधिक से अधिक सामीप्य चाहने लगते हैं।
जीवन के सफर में थक सा गया हूँ ।
लगता है कि मैं अब
बूढ़ा हो गया हूँ।
लोग कहते हैं
मैं पागल हो गया हूँ।
पर पागल की तो
याददाश्त चली
जाती है,मुझे तो यादें ही सताती हैं।
अतीत की स्मृतियाँ जीवन की अमूल्य थाती हैं।
अभी भी मन को अत्यंत भाती हैं।
मैं वही पुराना
अपना अतीत
याद करता हूँ,
सुखद पलों को ,उस अहसास को ,
जो बिछुड़े, फिर नहीं मिले,
उन अपनों को ढूॅढता हुआ
बड़बड़ाता रहता हूँ।
तुम कहते हो,
मैं पागल हो गया हूँ।
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