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प्यार करने के लिए
 मौसम की जरूरत  नहीं,
चाह हो तो हर हाल में
जिया जा सकता है।
जीने का हौंसला दीवानगी
की हद तक हो,
तो हॅस-हॅसकर जहर 
पिया जा सकता है।

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 : जूही, चंपा,  चांदनी
नहीॅ अब पहले सी सुगंध,
नहीं रही वह मादकता
जब से  तुम गए हो।
फूलों की रंगों की चटक, 
आंखो को लुभाने की शक्ति
सब तुम्हारे  जाने के बाद गायब हो गई।
अब तो उस हरसिंगार के नीचे
 जाते ही खड़े होते ही संकोच
होता है,
जिसके नीचे मैं  तुम्हे खड़ाकर 
उसे जोर से हिलाता था,
उस हरसिंगार के फूल 
बारिश की बूंदों  की तरह 
तुम्हारे− और मेरे ऊपर  गिरकर 
 दोनों को बुरी तरह सराबोर कर देते।
 दोनों को अपने में एकाकार कर लेते।
इस हरसिंगार के आड़े −तिरछे  तने से
कईं  बार  कमर टेक कर तुम बहुत देर 
खड़ीं मेरे से बात करती रहती थीं।
अब तो यह काफी कमजोर सा
 लगता है।
कभी यहां से गुजरो तो
इसे स्पर्श करते  निकल जाना
शायद तुम्हारे स्पर्श  से,
इसमें जवानी लौट आए।
अब तो मैं उन जगहों से 
आगे बढ़ आता हूं 
जहां तुम और
मैं मिलते या समय गुजारते थे।
−−−


ऐसे ही बीत रहा है जीवन,
कोई खास परिवर्तन नहीं।
जो दोनों के साथ होने पर 
खूब बरसाता था फूल,
तुम्हारे जाने के बाद से ,
अब तो वह हरसिंगार, 
बात भी नहीं करता।
जो साथ बैठने पर होती थी,
उस डिटोनिया की छाँव में  शीतलता
अब वह  नहीं है।
बहुत बार गुजरा हूँ ,
तुम्हारी घर की गलियों से,
वे भी  अब पहले सी, 
गीत गुनगुनाती नहीं।
  कितना कुछ बदल गया,
तुम्हारे जाने के बाद,
तुम्हें क्या पता?
तुम तो कभी लौटी नहीं।
मुड़कर देखा भी नहीं।
उन रास्तों पर जहाँ से कभी , 
साथ गुजरे थे हम,
वह दुकान ,जहाँ कभी ,
चाय पीते थे हम।
बन गया है वह अब एक मशहूर रेस्टोरेंट  ।
लुप्त हो गया वह स्थल भी ,
जहाँ बैठा करते थे तब।
उन जगहों पर स्मृतियॉ बिखरी हैं जरूर ,
पर अब वहाँ पर हमारा, 
नामो निशां तक भी नहीं।
आते-जाते  अब भी मैं,
वहाँ पहुँच जाता हूँ ।
पर अब कोई पहचानता भी नहीं।
जानता भी नहीं।
काश ,कभी तुम फिर आयी होतीं, ! 
तो देख पातीं इन परिवर्तनों को ।
अशोक मधुप


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−−

चलिए चलिए रिश्तों को निभाने चलिए।
चलिए चलिए कॉलेज में पुराने चलिए।
जीवन को गुनगुनाए एक युग बीत गया,
पार्क में बैठने,कुछ सुनने - सुनाने चलिए।
चलो फूलों की क्यारी के सिरहाने बैठे,
चटक फूलों की खुशबू में नहाने चलिए।
जिंदगी ने फुर्सत, न तुम्हे दी ,न मुझे दी,
आज फुर्सत है, एक गीत सुनाने चलिए।


 




ऐसे ही पथ भटके पथिकों  को,
उन लोगों ने लिया संभाला ,जिनका 
श्यामल तन था पर मन था उजला।
अभी भर आयीं हैं ऑखें ,
पोंछी तो ऑचल है गीला।
बहुत दिनों में छत पर दीखा,
इक छोटा सा काला बदला ।
मन शतदल कुम्हला गया है,
कब बरसेगा ? कुछ आस जगी है, 
लगता तो है आकाश धुँधला।


−−−

वक्त कितना बदल गया।
कभी दीप जलते थे।
ओर उनपर आकर
 जलते थे पतंगे।
अब न दीप जलते हैं
ओर न उनपर 
जलते हैं पतंगे।
दीप बन गए बिजली
के लट्टू।
खूब करतें हैं प्रकाश।
अनवरत देते हैं रोशनी।
न उनमें बार बार तेल
डालने की जरूरत।
न ही तेल खत्म होने
पर बुझने की परेशानी।
स्विच बंद किये जाने तक
बिजली उन्हें अनवरत
जलती है।
हां अब भी
एक बिजली के दीप पर
 आते तो है पतंगे।
उसपर जान लूटने
वाले कीट।
किन्तु अब ये ना 
दीप बुझा पाते हैं।
नही खुद जलकर
देतें हैं प्राण।
दीप कहो या वल्ब
या लट्टू।
एक यह पूरी रात 
जलता है।
प्रकाश बांटने के लिए।
पथिक को रास्ता
ओर दीखाने के लिए
पथ को जगमगाने
के लिए।
 

बहुत समय बाद।
वह आज दीख गया
बहुत समय बाद।
याद आ गया 
वह प्रेमगागर
जो कभी रीत गया।
एक समय बाद।
कभी लिखी गई थी
जिंदगी के पन्नों पर
याद आ गई वो कहानी।
एक समय बाद।


किसी तपस्या का वरदान हो तुम।
किसी पूजा का परिणाम हो तुम।
यज्ञ शाला की वेदी सी  तुम हो,
आरती जैसा सम्मान हो तुम।
−−
 हम सब तो हैं राही,
ट्रेन के साथी जैसे।
जीवन एक सफर है।
कोई यहाँ उतरा।
कोई वहां उतरा।
कुछ का सफर
जारी है।
कुछ के उतरने की
 तैयारी है।

−−−−

 लो मै यहाँ के समुद्र से भी
 एक नाता जोड़ आया हूँ।
बोतल में तुम्हारे नाम
 लिख कर एक चिट्ठी छोड़ आया हूँ।
 जानता हूँ शायद ही मिलना 
जिंदगी में हो सकेगा अब,
जवानी में ही मैं कब की 
ये उम्मीद आशा  तोड़ आया हूँ।


कितनी हमने गलतीं करली 
दिल दे बैठे तरुणाई में।
होता गर अब पास हमारे
महंगा बिकता महंगाई में।
−−
मैंने तुमको प्यार भेजा था,
तुमने उसे देखा भी नही।
समझा भी नहीं
जाना भी नही।
बस कूड़ेदान में फेंक
दिया।
पर उसमे मेरा  तो कुछ 
भी नही था।
सब तुम्हारा ही तो था।
प्यार, आकर्षण।
सौंदर्यबोध।


−−−−−−

आ गए लो फूल फिर ,
मौसम बसंत का  आ गया ।
बसंती बयार क्या बही!
भौंरे गुनगुनाने आ गए।
 मौसम सुहाना देखकर,
 सपने सुहाने आ गए।
परीक्षा की घड़ी और 
जगना रात भर ,
पूरे साल की मस्ती 
अब लगता था याद कर
आ गए फिर याद वो,
 काँलेज के जमाने आ गए।
वापसी का वक्त आया ,
याद साथी पुराने आ गए।

−−−

मेरी दीवानगी नही आसां है  समझना,
समझ सको तो मेरा अहसास समझो।
हवा की सरसराहट महसूस हो  जब,
तब कितने समीप  हूँ ये बात समझो ।



जब से पाया प्यार तुम्हारा ,
शत्रु बन बैठा जग सारा ।
जहाँ जीतने की आशा थी, 
वहीं पहुँचकर मैं हूँ हारा।
स्वप्न-  लोक दिखला कर तुमने ,
जग- यथार्थ से दूर किया है।
स्वर्ग दिखाने के चक्कर में ,
बना त्रिशंकु टाँग दिया है ।
इतना मधु दे डाला साथी! 
जो बन बैठा जीवन खारा ।
जहाँ जीतने की आशा थी, 
 वहीं पहुँचकर मैं हूँ हारा।
नूतन अर्चन रहा तुम्हारा, 
सारा पाप मुझे दे डाला।
पुष्प- हार दिखला कर तुमने।
 पहना दी काँटो की माला ।
राज महल की देकर कुंजी,
 देते हो तुम जीवन कारा।
 जहाँ जीतने की आशा थी,
 वहीं पहुँचकर मैं हूँ हारा।

अशोक मधुप

-

−−
जब निभा नहीं सकते ,
रिश्ता बनाते क्यों हो?
हमको दर्द दे जाय जो
 गीत गुनगुनाते  क्यों हो।
रोज बाते करते हों,
रोज वादा करते हो,
जब आ नहीं सकते तो,
आने को कहते क्यों हो?
रात भर देखा तुम्हें बाॅहों में ,
अधूरा ही रहना था सपन ,
सपना  जगाते क्यों हो?
न तो शिकवा ही है ,
न ही शिकायत कोई ,
सामने आने से तुम ,
फिर कतराते क्यों हो?
यह नाराजगी है या ,
या है शर्म औ हया,
हम तो समझ भी न पाए ,
 मुॅह फेरते हो तो,
मुस्कुराते क्यों हो?
इक झलक दिखला दो ,
दिल यह बहल जाए,
दिल कोई खिलौना तो नहीं?
अरमान जगाते क्यों हो?
पल का भरोसा भी नहीं,
मिलने को आ जाओ।
क्या कभी मिले भी थे हम?
याद दिला जाओ।
हम इंतजार भी ,
कर लेंगे कयामत तक।
बस आकर विश्वास दिला जाओ ।
अशोक मधुप
−− हम झुक झुक करें सलाम प्रिय।
आज तेरा बड़ा है नाम प्रिय।
तुझपे यौवन की आज हाला है,
आंखे मदिरा का जैसे प्याला है।
आज मेहरबान तुझपे  राम प्रिय।
Am
तूमने पूछा जो समझ  न आए ,
वह कौन है ?
मैंने उत्तर दिया -तुम
 तुमने फिर पूछा-
जो समझ आ जाए, वो कौन है?
 मैंने कहा -मैं।
अशोक मधुप



−− मैंने उसे पिस्तौल दिखाकर डराना चाहा,
 वह बोली--" नकली है "
 मैंने कहा- आज असली कहाॅ मिलता है? 
सब नकली ही है। मिलावटी ।धोखा ।
कभी मरने के लिए जहर खाओगे,
तो मर नहीं पाओगे।
वह भी नकली मिलेगा।
अब वह फेक्ट्री बन्द हो गयीं,
जिनमें असली माल बनता था।
ऐसे ही रहा तो अब  जल्दी
ही वह दिन आएगा,
कि अमृत पीकर आदमी 
मर  जाएगा,
क्योंकि अमृत हजम नहीं हो पाएगा ।
जहर खाकर अमर हो जाएगा।
संसार में सब तरफ विष ही व्याप्त है,
उसे खाने का अब अभ्यास है।
फिर विष ही विष को काटता है।
इसलिए मानव कैसे मर सकता है ?
सब कुछ उलट पुलट जाएगा।
प्यार करने वाला पछताएगा।
न करने वाला चैन की वंशी बजाएगा।
दवाई खाकर आदमी बीमार पड़ जाएगा।
बस नहीं बदलेगी
तो दोस्ती! प्यार! मनुहार!
माँ की ममता ! बाप का स्नेह, ! 
बहन का दुलार !
सच कहता हूँ मेरे यार।
अशोक मधुप
वही दर है, वही घर है ,वहीं राहें हैं।
अजनबी हैं यहाँ, अपना  महबूब नहीं।
अजीब गंध है,अनजान, नयी सी आज,
तेरे रहने का, मिलता कोई सबूत नहीं।
Am
कब तक सम्भाल कर 
कदम रखोगे मीत?
कभी मिलेगी हार तो ,
कभी मिलेगी जीत ।
जीवन सफर तय 
करने में 
लड़खड़ाना भी होगा,
गिरना भी  होगा।
पछताना भी होगा।
ठोकर  लगेगी,
मन विचलित करेगी।
कभी वफा ,कभी जफ़ा मिलेगी।
 चोट  लगेगी ,
दिल को घायल करेगी ।
कभी ऑखें भी भरेंगी ।
व्यथा अपनी कहेंगीं।
पर सफर तो पूरा करना
ही होगा।
कैसे भी चलो ,
चलना ही होगा ,
तुम को चलना ही होगा ।
आम
−−
बदली सूरज पे छाती जा रही है।
दामिनी भी गीत गाती आ रही है।
लग रहा मनमीत है ऐसा मुझे,
आज तेरी प्रेम पाती आ रही है।
अशोक मधुप
वर्ष 1975
−−
बदले से हालात है, बदला है दस्तूर।
तुम भूले कॉलेज सखा, होकर के मगरूर।
अशोक मधुप
−−
 मन का मंदिर बहुत वीरान नजर आता  है।
सोचता हूॅ तेरी तस्वीर  लगा कर देखूॅ।

−5
हम जहां थे, वहीं रह गए।
नदी नाले बहुत बह गए।
मौन रहकर मिला ये सिला,
लोग क्या क्या नहीं कह गए।

अशोक मधुप

इक दिवस, चाॅद से  मैं कहने लगा ।
क्यों तू प्रियजनों को वेदना देने लगा ?
चाॅद बोला -मुझे क्यों दोष देते हो ?
चाॅद तो बेकसूर है ।
उज्ज्वल चाॅदनी उसका नूर है।
जग को शीतलता देता है ।
उसकी पीड़ा को हरता है।
 विरह -वेदना के आॅसू लेकर,
फूलों को दे देता है ।
उनको खिलता -मुस्कुराता देखकर ,
हर्षित  होता है ।
फिर चला जाता है, परदेस ,
वहाॅ पर देता है संदेस ,
मित्रों के स्नेह और ममत्व का, 
उमंग भरे मिलन का ।                      
सुगंध उनके देश की माटी की ,
यादें पूनम की रातों की।
चाॅद को मीत बनाओगे तो ,
परदेस में भी उसके दर्शन पाओगे।
 गगन में उसके आलोक से ,
अपनत्व की प्रतीति होगी।
चाॅदनी की शीतलता से ,
सुखद अनुभूति होगी। 
विदेश में उस से बढ़ कर ,
नहीं कोई विभूति होगी।

अशोक मधुप
−−