Thursday, 5 September 2024

मुझको न दिल्ली भाती है ना दिल्ली दरबार सखे

 

मुझको न दिल्ली भाती है

  ना दिल्ली दरबार सखे!

मुझको बस अच्छा लगता है,

अपना घर और द्वार सखे!

ये नगरी पैसे वालों की,

नगरी यह धनवानों की,

मुझको भाते बस बिजनौरी,

बिजनौरी हैं यार सखे!

चाहे कितनी घूमूँ दुनिया,

चाहे कितना सफर करूँ।

मन रमता बिजनौर में आकर,

ये बिजनौरी प्यार सखे !

कहीं जाकर न मन मिलता है,

 ना ही मिलता है अपनापन ।

 बिजनौर ही है दुनिया अपनी ,

ये ही बस स्वीकार सखे !

जंगल से ये शहर लगे हैं,

बियाबान सी काँलोनी ।

सब अपने में मस्त यहाँ है,

इनका पैसा प्यार  सखे।

यहां सड़क पर भी पहरा है,

गली -गली  फैला कोरोना।

साँस यहां लेना दुष्कर है,

 है विषभरी  बयार सखे !

यहां दौड़ ही दौड़ मची है,

यहां दौड़ ही जीवन है,

तुमको ही ये रहे मुबारक,

 बेमुरव्वत  संसार सखे।

मेरे शहर में प्यार मिलेगा,

और  मिलेंगे दिलवाले,

तुम  तो राजा हो ,भूलोगे,

भूलोगे ये प्यार सखे,

पूरा शहर लगे है अपना,…

अशोक मधुप

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