Tuesday, 3 September 2024

बहुत साल बाद

 

बहुत साल बाद

बहुत साल बाद आज फिर उसी सड़क पर हूं,कभी  जहां  हम अचानक मिल गए थे।आज भी इस सड़क से गुजरते  नजर तुम्हें ही खोज रहीं हैं । शायद कहीं फिर दीख जा

बिजनौर मेरठ के बीच बैराज नहीं बना था।  उस समय मेरठ से गजरौला− चांदपुर होकर आना – जाना था। मैं मेरठ से आ रहा था। चालक के दूसरी साइड में खिड़की पर बैठा  सड़क देख रहा था।  सोच रहा था कि शायद तुम दिखाई  दे जाओ। तुम्हारे गांव वाले उस समय रिक्शा या घोड़े तांगे से जरूरत का सामान लेने इस शहर में आते रहतें थे। मेरी नजर सड़क पर ही थी कि शायद तुम दीख जाओ।  उम्मीद तो नहीं थी, किंतु एक छोटी सी  आशा जरूर थी। एक उम्मीद थी।

शहर की सड़क थी। भीड़ होने के कारण बस धीमी थी। एक तरह से रेंग सी रही थी। अचानक एक तांगे के पास से बस गुजरी। मैने देखा –तुम उस बस में बैठी हो। पता नहीं क्या हुआ। दोनों की नजर एक दूसरें से   मिली। लगा शायद तुम भी मुझे खोज रहीं थी। मैंने  जोर से चालक को आवाज देकर बस रोकने को कहा। बस बहुत धीमी थी। रेंग सी रही थी। तुम्हारे  तांगे से 50− साठ कदम दूर जाकर बस रूकी।मैं   बस से उतर कर धीरे− धीरे सड़क के किनारे− किनारे चलने लगा। तुम्हारा तांगा मेरी साइड से आगे निकला।  तुमने मुझे  देखा। मुसकायीं  और तांगे से उतर गईं।मेरे साथ− साथ  चलने लगीं।

शाम का  पांच बजे के आसपास का समय था। बहुत दिन बाद मिले थे। शायद चार पांच साल बाद। बात कम हो रही थी।  दोनों एक दूसरे को निहार ज्यादा रहे थे।

मैंने बात शुरू करने को पूछा− इस समय यहां कैसे। तुमने बताया कि एक नजदीकी रिश्तेदार की पत्नी अस्पताल में भर्ती है।  उसके परिवार में कोई नहीं है। उसके पास उसे ही रात में रहना है। रूटिन की दो चार बात हुंई। मैंने वैसे ही पूछ लिया। क्या करवा चौथ पर अब भी मेरे ही लिए वृत रखती हो।  उसने कहा− जब शुरू कर दिया। तो खात्म होने की बात ही नहीं। तुम मेरी रूह में बसे हो। कहीं भी रहूं।देह पर किसी का बस हो। रूह पर तुम्हारा ही अधिकार रहेगा। नाम किसी का भी लगे पर वास्तव  में   तो  उम्र ये  उपवास तुम्हारे ही लिए होगा। तुम्हारें मंगल के लिए। तुम्हारे शुभ के लिए

मैं तुम्हें  गौर से देख रहा था। तुम्हारी बात गौर से सुन रहा था। सड1क पर धयान नहीं था। ठोकर लगी तो  चौंका। चौराहा आ गया था । यहां से दोनों को अलग  अलग रास्तों से जाना था। बहुत बात करने कामन था।उसकी सुनने अपनी सुनाने का इरादा था। मुझे डर था क बिजनौर जाने   वाली आखरी बस  न निकल  जाए। उस भय था कि गांव का कोई हम – दोनों को एक साथ  न देख ले ।बहुत सारी अनकही , अनसुनी बातें मन में रह गईं। बहुत सारे प्रशन− सवाल लिए भारी मन से हम अलग− अलग रास्तों पर निकल गए। साथ चलने का मन था । साथा− साथ जीवन जीने का  इरादा तो सामाजिक बंदिश के कारण हम ने बहुत पहले छोड़ दिया था। आज कई साल बाद मिले। ये रास्ता भी बदलकर अपनी अपनी राह चलना पड़ा।

यहां से जो  रास्ता अलग  हुआ तो फिर कभी नहीं मिला। हम दोनों जाने किधर− कितने लंबे निकल गए। पता ही नहीं चला।

वैज्ञानिक – पुराने आदमी  कहतें हैं कि दुनिया गोल है। चलते रहो। एक दन फिर पुरानी जगह पंहुच  जाओगे। जहां से यात्रा शुरू की थी। आधी शती बात गई किंतु वह चौराहा फिर नहीं आया, जहां से हम अलग हुए थे।

आज फिर इसी रास्ते पर आना हुआ, जहां हम कभी अचानक मिल गए थे। 50 साल में इस रास्ते पर बहुत भीड़ बढ़ गई  । वाहनों की लाइन टूटने का नाम ही नहीं ले रही। आंखे  बैचेनी से आज भी उसी को खोज रहीं हैं।

हो सकती है कि आज भी तुम उसी रास्ते पर हो।तुम भी मुझे खेज रही हो।किंतु भीड़ में हम इक दूसरे को न देख पा रहे हों। हो सकता है कि तुम सड़क के दूसरी र हो। बीच से निकलने वाले वाहनों के  काफले के कारण हम एक दूसरे को न देख  पारहे हों। हो सकता है कि इस भीड़ में हम एक दूसरे  से टकरांए हो।पर पहचान न पांए हों। उस समय मैं  पतला− दुबला था। बड़ी दाढ़ी रखता था। अब क्लीन शेव हूं।मोटा हो गया। तोंद निकल आई।आंख पर चश्मा आ गया।सिर के सारे बाल सफैद हो गए। तुममें भभभभळ तुममें शलवार सूट पहनना छोड़ दिया होगा।अब साड़ी पहनती होंगी।कैसे पहचानूंगा।

याद आया तुमने मुझे अपना एक फोटो दिया था।जिसने तुम दुपट्टे से सिर ढकें थी।वैसे आज  स्त्री कहां सर ढकती है।अब तो बहुएं भी सिर पर दुपट्टा नही रखतीं।   

अशोक मधुप      

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