Thursday, 5 September 2024

सीलन भरे घर में मस्त हूं

 सीलन भरे घर में मस्त हूं

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बहुत साल बीत गए।
 आज अचानक याद आ गई।
तुम और मैं जब आखिरी बार मिले थे।
शहर के उसी रेस्ट्राॅ  में ।
जहां सदा  मिलते थे।
बैठते थे, बतियाते थे।
अपनी अपनी सुनाते थे।
कुछ गाते थे, गुनगुनातें थे।
हमारे बीच,
बहुत दूरी थीं।
धर्म की, जाति की,
 ऊंच नीच की,
सम्पन्नता की।
तुम एक उच्च परिवार की बेटी,
 लाड़ प्यार में पली।
सबकी की लाडली। 
प‌रिवार की इकलौती।
सौंदर्य क्या परियां भी लजाएं।
अप्सरा भी नजरें झुकाएं।
बेल की ट‌हनियों की लचकती देह।
छुओ तो मुरझा जाओ।
मैंने बहुत सोचा।
तुम्हारे निष्कलंक
प्यार को परखा
और जाना ‌कि तुम किसी 
बडे घर के शोकेस की शोभा के लिए हो।
मेरे छप्पर वाले घर के लिए नहीं।
मेरे पास तो कुछ भी नहीं।
दूसरे टाइम की रोटी मिलने की आस नहीं।
ये जानते भी तुम सब सहने को तैयार थीं।
मैंने तुम्हें सब बतलाया,
सच्चाई से अवगत कराया।
मजहब की दीवारों की दूरी बताई।
समय की सच्चाई समझाई।
और दोनों धर्म के आगे 
नतमस्तक हो गए।
अलग रास्ते पर चलने पर 
मरे मन से सहमत हो गए।
चाय पीते दोनों ने वायदा किया
कि अब कभी एक दूसरे के 
जीवन में नहीं आएंगे।
ना किसी को ये राज बताएंगे।
कभी सामने पड़े तो पहचानेंगे भी नहीं।
एक दूसर को जानेंगे भी नहीं।
आज के बाद दोनों के नए रास्ते होंगे।
नई मंजिल, नए सपने।
तय किया था कि रोकर विदा नहीं होंगे।
मुस्कुरा कर विदा होंगे।
यहां से हॅसते हुए
गुड बाय कह कर जाएंगे।
तुमने एक वायदा किया था।
कहीं भी होगी, किसी भी हाल में होगी।
आज विदाई के दिन साल में एक बार
मुझे पत्र जरूर लिखोगी।
पत्र में कुछ लिखना चाहो तो लिख देना
या पता लिखकर कोरा छोड़ देना।
मैं कोरे पत्र को अपने आप बाच  लूंगा।
तुम्हारे पता ‌लिखे पत्र को पहचान लूंगा।
बहुत साल बीत गए।
रास्ता बदले।
नई दुनिया बसाएं।
अब दोनों के नए घरोंदे है,
नई दुनिया।
अपनी अपनी दुनिया।
अपना घर, अपना परिवार।
इन सब के बीच।
मैं विदा होने का दिन नहीं भूला।
पूरे हफ्ते पोस्टमैन का इंतजार करता हूं।
अवकाश लेकर घर के बाहर बैठा
उसका रास्ता तकता हूं।
आधी सदी बीत गई।
 50 साल  यूॅ तो अब तक
पचास से ज्यादा पत्र आ जाते।
पर एक ही नहीं आया।
मैं जानता हूं,
इतने समय बाद अब क्या आएगा?
तुम्हारा पत्र। कोई संदेश।
मित्रों और बच्चों ने बहुत कहा।
बहुत छोटा −छोटा घर है।
अब तो अच्छी आय है,
पुराना घर का मोह छोड़ो।
कहीं अच्छी जगह खुला घर बनाओ।
उसके आंगन में शानदार बगीचा लगाओ।
बगीचें में लगाओ
जूही, चंपा, डहलिया, चांदनी,टयूलिप और सिंगार।
रात की रानी, दिन का राजा,गुलाब व गेंदा।
नए −नए फूल, नए नए पौधे।
घर का बड़ा गेट हो।
उसके बाहर बरांडे में पड़ा हो झूला।
जिसमें सवेरै तुम और मैडम बैठकर झूलें।
बगिया और लॉन को निहारें।
ये तो सीलन भरा है,
पुराना मकान है,
न ढंग से रोशनी आती है ना हवा।
ऐसा मकान बनाओ
जिसमें उठते ही 
‌खिड़कियों पर पड़ें सूरज की रोशनी।
खूब प्रकाश और  ताजी हवा मिले।
सबके अपने अपने सुझाव,
 अपने अपने आइडिया।
किंतु मैने आज तक भी नहीं बदला घर।
वही सीलन भरा घर अपनी कोठी है।
यही अपना राजमहल।
क्योंकि तुम्हारा पत्र
कभी आया तो इसी पते पर आएगा।
डाकिए को नए घर का पता कौन बताएगा?
इसीलिए मैथ अपने इसी सीलन भरे
राज महल में मस्त हूँ।
तुम्हारें पत्र के इंतजार में व्यस्त हूँ।

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