सुखद अतीत का व्यतीत पल ,
अनायास जीवित हो गया ।
कुछ पुराने सामान की
छॅटनी करते समय,
संदूक में रखी एक पुरानी शर्ट
देखकर मैं चौंक गया।
लगभग 50 साल पुरानी शर्ट।
पीले, हरे रंग की , बड़े चेक की शर्ट,
पढ़ाई के समय की, मेरी प्रिय शर्ट!
पल भर में सब कुछ याद आ गया,
याद आ गया कि यह शर्ट तो तुम्हें
भी बहुत पसंद थी।
मैं इसी शर्ट को पहनूँ ,
लंबे बाल रखूँ ,
तुम्हारी सदा इच्छा रहती थी।
जीवन की सबसे प्यारी,
पसंदीदा शर्ट!
कब संदूक में रखी गयी ?
याद ही नहीं।
कैसे रखी गयी ? पता नहीं।
पचास वर्ष, एक अर्धशतक !
व्यतीत हो गया ,
अतीत की स्मृति से मैं व्याकुल हो गया।
इतनी अवधि से रखी होने से ,
बुरी तरह मुस गई है।
जगह −जगह सलवटें पड़ गयी हैं।
इसका क्या दोष ?
इस अंतराल में ,
जाने कितनी शिकन चेहरे पर आ गयीं हैं।
शर्ट की शिकन तो मैं देख रहा हूँ,
दर्पण नित्य देखने पर भी ,
चेहरे की शिकन से अज्ञात रहा हूँ ।
वे कब चेहरे पर आ जमीं?,
नयनों में आ गयी नमी ।
शर्ट को उठाकर धीरे से,
उसे खोलता हूँ ।
झटक कर, हाथ फेरकर ,
सलवटें हटाने की कोशिश करता हूँ।
किन्तु कमीज की सलवटें ,
यादों की परतें
हटाने पर भी नही हटतीं।
विगत को जीवंत करने को
लालायित मैं,
रह जाता हूँ असफल,
वे इतने लंबे समय से
रखे रखे हो चुकी हैं,
भाग्य सी निष्ठुर ।
नहीं खुलती खोलने पर भी।
ऐसे ही तो मिट्टी ,
कपड़ा, फल- पत्ते
और मानव शरीर ,
लंबे समय पत्थरों में दब ,
बन जाते हैं फोसिल्स ।
शर्ट के स्पर्श का
अहसास अकथ्य है ।
अतिप्रिय होने से,
वह कल्पना के योग्य है ।
अचानक उसकी ऊपर की जेब में,
हाथ डालता हूँ।
जेब में कुछ कचरा सा मिलता है।
बाहर देखता हूँ निकाल कर,
चौंक पड़ता हूँ देखकर ।
कचरा कुछ और नही,
मूंगफली के छिलके हैं।
बहुत पुराने छिलके ,
शर्ट के पहनने के समय के ।
जवानी के आलम के ।
और याद आ गयी वह कहानी,
तुम्हारे साथ बिताए, पल,
जो बीत चुका है, वह सुनहरा कल।
सब कुछ भूल, अतीत में चला गया,
याद आ गए , तुम्हारे साथ बिताए,
एक एक क्षण ,एक एक पल ।
मूंगफली के इन छिलकों को देख ,
भूली यादें ,स्मृति पर छा गयीं ।
मन को मधुर आभास करा गयीं ।
जब तुम और मैँ कॉलेज के लान में ,
डिटोनिया की एक झाड़ी के पास बैठे ,
खा रहे थे मूंगफली।
छिलके इकट्ठे करते जा रहे थे,
एक रूमाल पर।
कई दिन की छुट्टी
और मौसम खराब होने के बाद,
काँलेज आज खुला था ।
सवेरे आसमान में ,
बहुत घना कोहरा था।
किंतु अब मौसम साफ था।
हलकी कुनमुनी धूप
अच्छी लग रही थी।
शरीर को सुख दे रही थी।
आज कॉलेज में आवाजाही,
बहुत कम थी ।
हमारे जैसे, कुछ जोड़े ही दिख रहे थे ।
धूप का आनंद ले रहे थे ।
कुछ अलसाए,
अपने में मस्त, प्यार में डूबे,
एक दूसरे में खोए।
तुम मुझे और मैं तुम्हे ,
खाने को दे रहे थे दाने ,
मूंगफली छीलकर ,
एकत्र करते जा रहे थे,
मूंगफली के छिलके ,
एक रुमाल पर ।
दोनों पूरी तरह
बातों में मस्त थे।
एक दूसरे की
आँखों में झाँकते, बातें
करते, खाते जा रहे थे ,
मूंगफली के बादाम जैसे टैस्टी दाने।
मूंगफली खत्म होने को हैं,
ध्यान ही नहीं था ।
तुम्हारे चेहरे की
मुस्कराहट का अर्थ,
नहीं समझ पा रहा था,
अचानक तुमने झटके से
रूमाल उठाया,
उसपर एकत्र किए छिलके,
फेंक दिए मेरे ऊपर
उतार दिए मेरे कपड़ों पर।
और शरारत से हॅसती
भाग गयीं कामन रूम में ।
आज पचास साल बाद मिली ,
इस शर्ट की जेब में मिले,
मूंगफली के ये छिलके ,
याद दिला गए उस घटना की ,
तुम्हारे साथ बिताए,
उन क्षणों की
जिन्हें मैं भूल चुका था
बिसरा चुका था।
No comments:
Post a Comment