Thursday, 5 September 2024

पिछले 50 साल में

 पिछले 50 साल में

वायदे के बावजूद
तुम्हारा कोई पत्र
तो नहीं आया।
कोई संदेश भी 
नहीं मिला।
जिस के पत्र की प्रतीक्षा में,
ऑखें तरस गयीं थीं ,
आशा की कड़ियाँ  भी ,
टूट गयीं थीं।
अनायास ही ,
 आज प्रातः ही 
नजर आ  गयीं  तुम
फेसबुक पर ।
विश्वास  न कर सका 
अपनी ऑखों  पर ।
पहले सदा सलवार सूट में
होतीं थीं।
पहली बार साड़ी में देखा।
भूल गया, क्षण भर को, 
अतीत और भाग्य की रेखा ।
कई मिनट गौर से देखा,
बिना पलक झुकाए।
सुधबुध बिसराए ।
अब तो बहुत बदल
गई हो तुम।
झील सी ठहर गयी हो तुम ।
शरारत झलकाती आंखे अब
शांत है।
आयु का असर नजर आने लगा है।
बहुत गम्भीर हो गई हो तुम।
हो सकता है वक्त 
के थपेड़ों ने तुम्हे गंभीर कर  दिया।
 अपलक मेरे निहारने के दौरान,
तुमने एक बार भी 
नहीं झपकाई पलक,
नहीं की कोई शरारत,
नहीं फेंका मेरे ऊपर ,
कागज का कोई गोला।
पेन से मेरी हथेली पर तुमने 
नहीं लिखा अपना नाम।
नहीं बनाया दिल का निशान।
अचानक ध्यान आया कि
मेरे सामने तुम्हारा चित्र है।
तुम नहीं।
यह सपना सा है, 
हकीकत  नहीं ।
बीते 50 साल की
कहानी जानने की 
प्रबल इच्छा है।
कहाँ हो? कौन −कौन हैं?
ये जानने का मन तो है।
पर फेसबुक के अबाउट पर जाते
उंगली रुक जाती है।
हाथ थम जाता है।
विदा होते समय
किया वादा याद आ
जाता है।
एक दूसरे के जीवन
में न आएंगे।न एक दूसरे के
बारे में जानेंगे।
बड़ी मुश्किल से
कर पाता हूं मन पर
नियंत्रण।
फेसबुक बंद कर
ख्यालो में खो जाता हूँ।
आंखे बंद कर सोचने लग जाता हूँ।
कितना कुछ बदल गया 50 साल में।
रोज टूट रहे हैं जाति के बंधन,
समाज में आ रहा है परिवर्तन ।
बहुत कुछ बदल 
रहा है।
धर्म की सुदृढ़  दीवार ,
हिलने तो लगी है ।
अंतर्जातीय विवाह के लिए, 
नयी पीढ़ी  कमर कसने लगी है ।
पर अभी शेष  हैं 
कुछ परिवार के झूठे अहम,
मिथ्या सम्मान ।
करना पड़ रहा है, 
युवक −युवतियों को  बलिदान ।
मंज़िल को न पा 
युवा जोड़े रोज खा रहे है जहर।
दे रहे हैं प्राण।
या हो जाते है 
ऑनर किलिंग  के शिकार ।
इसके बावजूद 
परिवर्तन स्वीकारना
होगा।
अब तो गांव में भी
होने लगे हैं प्रेम विवाह।
टूट रहे है जाति के बंधन।
टूट रहे ही धर्म की रेखा।
शिक्षा और शहरों
से समाज में
बदलाव आया है।

काश ऐसा हो गया होता।
तो तुम ओर में भी अलग न होते।
कोई बात नही।
अब बदलाव की बयार आई है।
शिक्षा की ज्योति जाति धर्म 
छुआछूत मिटाने आई है।
टूट रही हैं सीमाएं।
टूट रहे हैं मानदंड
उम्मीद है सब बदलेगा।
जो त्याग तुमने हमने किया
वह बच्चों को नहीं करना पड़ेगा।
मेरा एक मित्र है क्रिश्चन 
पत्नी वैश्य।
इन्होंने शादी की ,
पर धर्म  नहीं  बदला,
इसके घर  क्रिसमस भी मनता है।
दीपावली पर दीपमाला भी सजती है।
दशहरा पर भी पूजन होता है।
अब तो हिन्दू मुस्लिम से मुस्लिम हिन्दू
से करने लगा है शादी।
मेरी तमन्ना है कि एक ही  घर में 
एक दिन ईद मने तो दूसरे दिन
दीपावली।तीसरे दिन क्रिसमस।
इंतजार करो मित्र होगा।
समाज के आगे हमारे बच्चों
के अब सपने नही टूटेंगे।
टूटेंगी तो जाति और धर्म
की दीवारें।
फिर  देश में जाति और
धर्म के नाम पर
न होगी राजनीति।
न होंगे दंगे।
सब होंगे भारतीय
और भारतवासी।


फेसबुक तू भी अजीब
समस्या खड़ी करता है।
कई दिन से एड फ्रेंड में
उसे दिखा रहा है,
जिसे मैंने कभी ,
दीवानगी के साथ चाहा था।
उसने भी मुझपर,
जी भरकर प्यार लुटाया था,
पर वक्तने नहीं दिया था साथ।
क्या मज़बूरी है कि आज
मैं उसे न फ्रेंड लिस्ट में एड
 कर सकता हूँ।
पुरानी परिचित होने 
के बावजूद उसे
फ्रेंड रिकवेस्ट भी
नही भेज सकता हूँ।



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