Thursday, 5 September 2024

सखि ही सही , तुम हो तो

 सखि ही सही , तुम हो तो ।

जीवन - साथी न सही, 
पर साथ हो तो ।
अच्छा है कि तुम -हम 
मित्र हैं। अच़्छे मित्र !

दुख- सुख के साथी।

एक दूसरे के मददगार।

एक दूसरे को समझने वाले ,
मित्रता में बराबर के साझीदार।

चेहरा देखकर ही ,भाव पहचानने वाले।
आवाज से मन की बात ,जान जाने वाले।

अच्छा हुआ हम नहीं ,बन पाए पति -पत्नी।

नहीं बन पाए जीवन सखा।

नहीं बॅध पाए दांपत्य सूत्र में।

पति -पत्नी होते तो ,नहीं होता

बराबर का रिश्ता।

नहीं होती ,बराबर की पहचान।

पुरुष प्रधान समाज में तुम्हें!

नहीं मिलता बराबर का मान।

बराबर का सम्मान।

बराबर का दर्जा ,कभी नहीं पातीं।

कभी झिकड़की झेलतीं,

तो कभी डाँट पातीं।

कभी -कभी तो बेवकूफ

और पागल जैसे शब्दों से

सम्मानित की जातीं । 

तुम पति  के   इशारों पर मुस्करातीं।

उसके गुस्से पर कुम्हला जातीं।

घर को अपना सर्वस्व देंती।
पति के लिए सजतीं,
उसी के लिए सँवरती।

पर बहुत कुछ झेलतीं। 

कभी बच्चों में ,तो कभी परिवार में बॅटतीं।

प्यार में भी सब का बराबर हिस्सा करतीं।

तुम करती सबसे न्याय,

पर तुम गृहणी होकर भी ,पति से कम रहतीं।

पति का वर्चस्व बना रहे ,

इसलिए हर पर्व पर पति के पाँव छूतीं

उसे पति परमेश्वर मानतीं।

और पति कभी नहीं मानता 
तुम्हें अपने बराबर।

तुम्हारे लिए वह पति परमेश्वर होता,

किंतु  तुम उसके लिए कभी 
  देवी नहीं बन पातीं।

तुम तो उसकी पत्नी ही रहतीं।

  वह करता  तुम पर शक ।

सप्तपदी के सारे  वचन तुम्हारे लिए रहते ,

सारी जिम्मेदारी तुम्हारी होंती।

तुम साल में कई बार उसके पाँव छूतीं,

कहने पर पाँव दबातीं।

सिर में तेल और बालों में मेंहदी भी लगातीं।
पति के आफिस जाते समय उसकी 
टाई ठीक करतीं।
उसके आफिस जाते समय तैयार 
होने में मदद करतीं।
आफिस से लौटने पर 
दरवाजे पर संजी उसका  इंतजार करती  होतीं।
आफिस से लौटने के बाद 
उसके फ्रेश होते तक चाय तैयार कर लेंती।
उसकी पंसद, न पसंद का ध्यान  रखतीं ।
पर तुम्हारे  आफिस जाने के समय 
तुम्हें तैयार होने में कोई मदद नहीं करता।
लौटने पर कितनी ही थकी –हारी
होतीं,
 पर किसी को नहीं होता तुम्हारा ध्यान 
न कोई तुम्हें एक गिलास  पानी पकड़ाता,
नही तुम्हारे लिए 
एम कप चाय बनाता।
किसी को नही होता तुम्हारी 
थकान का भान।
तुम आते ही घर के काम− काज 
में लग जातीं।       
तुम्हारे बीमार या थके होने से

नहीं होता किसी का वास्ता,

किसी परिवार के दूसरे सदस्य का लेना −देना।

तुम तेज बुखार होने, शरीर टूटने

 के बाद भी परिवार के लिए जूझतीं।
रोजमर्रा की तरह 
सारे काम वैसे ही निपटातीं।
तुम्हारी परेशानी में 
न पति सिर में तेल लगाता।

न  कोई पाँव  दबाता।
न तुम्हारी पंसद− नापसंद 
 का ख्याल  रखता।
सब कुछ तुम्ही झेलतीं।
सारी जिम्मेदारी तुम्हारी ही होती। 
बहुत अच्छा हुआ मित्र!

हम नहीं बंध सके प्रणय -बंधन में ।

नहीं परवान चढ़ सका अपना प्यार।
अब हम न लड़ते हैं, ना झगड़ते हैं।
मित्र  हैं साथ साथ चलते हैं।

अशोक मधुप

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