Thursday, 5 September 2024

अब खत आने बंद हो गए,

 अब खत आने बंद हो गए,

सभी तरह के खत।
जो लाते थे मित्रों के संदेश।
बड़ों के आशीर्वाद।
छोटों को शुभकामनाएँ।
प्रियों का प्यार।
पत्र आते थे तो
रहता था ,डाकिये 
के आने का इंतजार।
कुछ तो पत्रों के इंतजार में
रोज पोस्ट ऑफिस ही
पहुँच जाते।
यहाँ अपने  जैसे आने वालों से 
गप्पें लड़ाते ।
पहले दिन के किस्से सुनते-सुनाते,
अपने सुख −दुख
बाँटते।
इतनी देर में डाक कर्मी चिट्ठी छाँटते।
असीमानंद मिलता था, 
पत्र पढ़कर ,उनको रखते थे हम संजोकर ।
एक तार में।
इस तार में बिंधी होती थी
सब तरह की चिट्ठी 
दुख की, सुख की। 
 कभी तकरार की ,
तो होती थीथ प्यार की,
इसीलिए तो सब दीवानगी से करते थे, 
डाकिये का इंतजार ।
अब ऐसा कुछ नहीं रहा।
मोबाइल ने सब बदल दिया।
 न पत्र आते हैं,
न होता है डाकिये 
का इंतजार।
एक पल में मैसेज
हो जाता है इधर से उधर,
मेरे पास से तुम्हारे पास।
वैसे आज बताने को नहीं कुछ खास।
रूटीन में सुप्रभात भेज दिया।
यह बताओ ,
तुमने क्या किया आज ? 
अशोक मधुप ।

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