Thursday, 5 September 2024

किंतु तुम वहाँ नही हो

 किंतु तुम वहाँ  नही हो


तुम्हारे मुहल्ले से निकलते 
आज भी मैं
तुम्हारे घर के
दुमंजिले की उस 
दीवार को जरूर 
देखता हूँ।
इसी दीवार के पीछे
ही तो  खड़ी होकर 
तुम मेरा इंतजार
करतीं थीं।
दीवार के पीछे चमकती थीं
तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी 
आंखें और सिर।
अब तो  वहाँ कुछ 
भी नजर नहीं आता।
बहुत  साल बीत गए,
अब तो  यह दीवार भी
बूढी हो गई
मेरी तुम्हारी तरह
सालों से नही हुई 
इसकी पुताई
प्लास्टर भी 
जगह− जगह 
से झर गया है।
आने लगी हैं
दरार।
कुछ पेड़ भी उग आए हैं।
काफी बड़े दीखने  लगे 
दीवारों में उगे ये पेड़ ।
इन पेड़ों की तरह ही तो
हमारे बच्चे  अब 
जवान हो गए हैं।
इतने साल बाद भी 
मुझे तुम्हारे 
घर के सामने से निकलते
इस दीवार को देखने की मेरी 
ललक नहीं गई 
अब पता नहीं 
परिवार के साथ
तुम कहां  होंगी।
पर मेरा मन नहीं मानता।
बरबस दीवार पर नजर 
चली ही जाती है।
खोजती रहती है तुम्हें।

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