Thursday, 5 September 2024

अमेरिका का टेम्पा शहर।

 अमेरिका का टेम्पा शहर।

समुद्री तट पर स्थित 
फ्लोरिडा प्रदेश का अत्यंत खूबसूरत शहर!
बड़ा बेटा रहता है यहां।
आजकल उसके पास आया हुआ हूँ।
कुछ पारिवारिक  जिम्मेदारी निभाने।
आवश्यक  कार्य निपटाने।
आज हम घूमने आया हैं समुद्र किनारे,
दूर दूर तक लहराता समुद्र,
मन को उद्विग्न करने लगा है ।
 किनारे पर बिछी शीतल रेत में ,
बैठ जाता हूँ, सुकून की तलाश में।
ऐसी जगह जहाँ
लहरें आतीं है,
मेरे पाँव को छूकर लौट जाती हैं।
उनके शीतल स्पर्श  का अहसास ,
सुखद प्रतीत होता है ।
तुम्हारे साथ बिताए पलों में पहुँचा देता है । 
समुद्र की मचलती ,उमड़ती ,
लहरों को देख रहा हूँ, 
 निहार रहा हूँ।
तरंगों  की तरह मन में ख्याल
आ रहे हैं ,जा रहें हैं।
तुमसे विदा हुए 
एक युग बीत गया।
आज तुम्हारी बहुत
याद आ रही है।
ये उठती -गिरती व्याकुल लहरें ,
मन को उद्वेलित कर रही हैं।
फेसबुक पर 
तुम्हारे प्रोफ़ाइल के
चित्रों में 
एक चित्र ऐसा लगता है,
मिलने की आशा सी जगाता है ,
जिसमें तुम परिवार के साथ हो,
ऐसे ही समुद्र के किनारे हो।
मैं चारो ओर नजर दौड़ा रहा हूँ
शायद तुम कहीं नजर आ जाओ।
एक झलक दिखा जाओ।
बहुत परिवार दीखते हैं।
अंग्रेज जोड़े तो
सौंदर्य की प्रतिमा से लगते हैं,उन से
बात करने को मन करता है।
परियों सी ,
श्वेतवर्णी ,कोमलांगी, 
बड़ी बड़ी आँखों वाली युवतियों को ,
देखने को दिल तो करता है ।
पर मेरी इनमें रुचि नहीँ।
मै तो यहां आए
भारतीय परिवारों में तुम्हें,
खोज रहा हूँ।
तुम्हारे परिवार को ढूँढ रहा हूँ ।
मन में ऊहापोह है कि
तुम मिल गयीं तो,
क्या पहचान पाओगी?
क्या मैं तुम्हें पहचान
पाऊंगा?
पहचान भी गए तो क्या
एक दूसरे से बात
कर पाएंगे?
सामने आने पर पहचान
कर भी क्या 
मुँह घुमाकर निकल जाएंगे?
या बात कर पाएंगे?
मैं अपनी पत्नी और
बच्चों को क्या बताऊंगा?
तुम को किस संबोधन से मिलवाऊॅगा?
तुम कौन हो?
क्या  परिचय है?
हम एक दूसरे को
कैसे जानते हैं?
तुम मेरे लिए कुछ  बता पाओगी 
अपने परिवार को?
या नज़र झुका कर ,
अजनबी सी बन जाओगी।
बहुत दुविधा है मन में ,
एक अजीब सी  बेचैनी भी तन में।
अचानक मुझे 
पानी की एक खाली
बोतल दिखायी देती है,
बोझिल मन को संबल देती है । 
जैसे आशा की कोई किरण दिखाई देती है ।
उसे उठाकर उलट -पलट कर देखने 
लगता हूँ ।
कुछ सोचने लगता हूँ । 
मन में एक ख्याल आ रहा है,
एक जा रहा है।
अचानक जेब से डायरी निकाल
उसके एक पन्ने पर अपना नाम
और पता लिखता हूँ।
तारीख और शहर का नाम
एक कोरे कागज पर लिखकर
बोतल में डाल देता हूँ।
अपनी कल्पना को पंख देता हूँ।
नाम, पते वाला कागज ऐसे
रखता हूँ कि
पढ़ा जा सके,
 समझा जा सके।
बोतल का ढक्कन 
बन्द करके ,कसके ,
फेंक देता हूँ उसे ,
उन उमड़ती लहरों में ,
पूरी ताकत लगाके।
यह कल्पना  करके,
कि कभी कहीं समुद्र के किनारे पर।
घूमती हो अगर ,तो शायद 
यह बोतल तुम से 
टकरा जाए ,काश ऐसा हो जाए, 
तो मेरे नाम और पते से अंदाज 
लगा लेना कि
मैं जहाँ भी हूँ,
बोतल छोड़ने की तारीख तक
स्वस्थ हूँ।
पर तुम्हें अब तक ,
भुला नहीं सका हूँ।
बोतल के रखे खाली
कागज से तुम्हें आज की तारीख
और जगह का पता 
मिल जाएगा।
कोरे कागज
में बंद मेरे मन के भाव-
विचार तुम खुद बाँच लेना।
कितना याद करता हूँ जान लेना।
तुम तो मेरे लेख से
मेरे मन के भाव जान जाती हो,
किस हालत में हूँ पहचान  जाती हो।
बोतल में रखे कागज से सब जान लेना,
पहचान लेना।
दिन छिपने लगता है,
तारे निकलने लगते हैं।
बच्चे और पत्नी भी
वापिस लौटने को
कहने लगते हैं।
मैं  भारी मन से 
अन्तिम बार समुद्र को
निहार , उठ जाता हूँ
मन में 
उससे विनती करता हूँ
कि मेरे नाम लिखी
बोतल तुम तक
गन्तव्य तक पहुंचा देना ।
जहां भी तुम हो।
जिस देश मे भी तुम हो।
जैसी भी तुम हो,
मेरा संदेश तुम तक पहुँचा देना।

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