Tuesday, 3 September 2024

जूही, चंपा, चांदनी

 

जूही, चंपा,  चांदनी

नही अब पहले सी सुगंधा

नहीं रही वह मादकता

जब से  तुम गए हो।

फूलों की रंगों की चटक,

आंखो को लुभाने की शक्ति

सब तुम्हारे  जाने के बाद गायब हो गर्इ।

अब तो उस हारसिंगार के नीचे
 जाते ही खड़े होते ही संकोच

होता है,

जिसके नीचे मैं  तुम्हे खड़ाकर

उसे जोर से हिलाता था,

उस हरसिंगार के फूल

बारिश की बूंदों  की तरह

तुम्हारे− र मेरे  गिरकर

हम दोनों को बुरी तरह सराबोर कर देते।

हम दोनों को अपने में एकाकार कर लेते।

इस हरसिंगार के आड़े −तिरछे  तने से

कर्इ  बार  कमर टेक कर तुम बहुत देर

खड़ीं मेरे से बात करती रहती थी।

अब तो यह काफी कमजोर सा

 लगता है।

कभी यहां से गुजरों तो

इसे स्पर्श करती  निकल जाना

हो सकता है

इसे हमारी याद आ जाए।

शायद तुम्हारे स्पर्श  से

इसमें जवानी लौट आए।

अब तो में उन जगहों से

आगे बढ़ आता हूं

जहां तुम और

मैं मिलते या समय गुजारते थे।
−−−

किंतु तुम वहां  नही हो

तुम्हारे मुहल्ले से निकलते

आज भी मैं

तुम्हारे घर के

दुमंजिले की उस

दीवार को जरूर

देखता हूँ।

इसी दीवार के पीछे

तो खड़ी होकर

तुम मेरा इंतजार

करतीं थीं।

दीवार के पीछे चमकती थीं

तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी

आंख और सर।

अब तो  वहां कुछ

भी नजर नहीं आता।

बहुत  साल बीत गए,

अब तो  यह दीवार भी

बूढी हो गर्इ

मेरी तुम्हारी तरह

सालों से नही हुर्इ

इसी पुतार्इ ।

प्लास्टर भी

जगह− जगह

से झर गया है।

आने लगी हैं

दरार।

कुछ पेड़ भी उग आए हैं।

काफी बड़े दीखने  लगे

दीवारों में उगे ये पेड़ ।

इन पेड़ों की तरह ही तो

हमारे बच्चे  अब

जवान हो गए हैं।

इतने साल बाद भी मुझे तुम्हारे

घर के सामने से निकलते

इस दीवार को देखने की मेरी

ललक नहीं गर्इ।

अब पता नहीं

परिवार के साथा

तुम कहां  होंगी।

पर मेरा मन नहीं मानता।

बरबस दीवार पर नजर

चली ही जाती है।

खोजती रहती है तुम्हे।

अशोक मधुप

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घर में पुरानी  किताब

खोजते

कुछ उपऩ्यास मिल गए।

मैं  उन्हें उलटने− पलटने लगा।

तुम्हें− मुझे  दोनों को ही

पसंद था उपन्यास पढ़ना।

तरह −तरह के उपन्यास।

सब पर कवर चढ़े हैं।

इनके कवर खोलकर देख

रहा हूँ।

शायद कोर्इ तुम्हारा पत्र

मिल जाए।

यहीं तो रखकर

तुम भेजतीं थी

मुझे पत्र।

हालाकि मैंने  अलग होते

सब तुम्हारे पत्र− फोटो

तुम्हे दे दिए थे।

याद है न

उस दिन बहुत ठंड थी।

एक या दो जोड़े ही थे

उस दिन कॉलेज की कैंटीन में।

तुमने कैंटीन के कारीगर से बात करते।

 सारे पत्र डाल दिए थे

पास में धधकती

भट्टी में।

उन्हें देर तक जलते देखते रहे थे

हम दोनों।

कारीगर ने कहा था−

सब जल गऐ।

मैंने उससे भट्टी की राखा साफ करने वाला

सरिया लेकर पत्रों को कुचल

और  पीसकर

राख बना दिया था।

तुमने कैंटी के नोकर को

कुछ सिक्के देकर

कहा था।

इस राख को इधर− उधर मत

डालना।

पानी में घोलकर

सामने लगे दरख्त की जड़ में डाल देना

 ताकि हमारे सपनों की राख

उन वृक्षों की जड़ में पड़कर

बन जाए खाद।

करे इन वृक्षों का विकास।

मैं इन किताब पर जमी धूल उतार

इन पर चढे कवर में खोज

रहां  हूं तुम्हारा कोर्इ  पत्र।

कोर्इ  याद।

एक पन्ने  पर लगा

रंग देखकर रूक जाता हूँ।

याद आता है कि  इस उपनयास के पढ़ने

के दौरान ही होली के दिनों में अपने

पर्स से निकाल पर पुड़िया

लगा दिया था मेरे चेहरे पर गुलाल।

मैंने भी मौका पाकर

किसी को अपनी ओर न देखने

के समय अपना गाल

रगड़ दिया था तुम्हारे गाल पर।

 चेहरे से छुड़ाकर कुछ गुलाल

लगा दिया था

उस जगह

जहां मांग भरी  जाती है,

इस तरह की किसी को संदेह भी न हो।

 

अशोक मधुप

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